June 21, 2024

संवाददाता।
कानपुर। नगर मे मेडिकल कॉलेज के हड्‌डी रोग विशेषज्ञ डॉ. फहीम अंसारी ने बताया कि यदि आप अधिक तेल मसाले वाला खाना पसंद करते है तो आपको सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि आज कल तेल मसाले में उतनी शुद्धता नहीं रह गई। इस कारण आज कल कम उम्र के लोग भी घुटने की समस्या से जूझ रहे है। होटल और रेस्टोरेंट में प्रयोग किए जाने वाली खाद्य सामग्री की क्वालटी भी बहुत खराब होती है, जो कि आपकी हडि्डयों को कमजोर बनाती है। बाहर के खाने में पाम आयल, रिफाइंड व मैदा का अधिक प्रयोग होता है। साथ ही कड़ाही में भी घंटों तेल जलता रहता है। इससे तैयार किया गया कोई भी खाद्य पदार्थ का यदि आप अधिक सेवन कर रहे है तो हानिकारक रसायन घुटनों के जोड़ व कार्टिलेज में जाकर उसे प्रभावित करने लगते हैं। यही कारण है कि युवावस्था में ही घुटने की झिल्ली सूख रही है। हैलट अस्पताल के आर्थो विभाग की ओपीडी में इन दिनों प्रतिदिन लगभग 150 मरीज हड्‌डी की समस्या के साथ आ रहे है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के हड्‌डी रोग विशेषज्ञ डॉ. फहीम अंसारी ने बताया कि इन मरीजों में 60 से 70 प्रतिशत मरीज घुटने में सूजन, गठिया व घुटने की झिल्ली सूखने की समस्या से पीड़ित मिल रहे हैं। इसमें महिलाओं की संख्या लगभग 60 प्रतिशत के आसपास है। डॉ. फहीम ने  बताया कि गठिया के मरीजों के घुटने में सूजन आ जाती है और कुछ की झिल्ली सूख जाती है। ऐसे मरीजों को चलने-फिरने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा ऐसे मरीज ज्यादा देर तक एक स्थान पर भी नहीं बैठ सकते है। इनको घुटने का मुमेंट करने में भी बहुत तकलीफ होती है। डॉ.फहीम अंसारी ने बताया कि कोविड के बाद से लोगों में घुटने से संबंधित समस्या अधिक बढ़ गई है। जहां गठिया या घुटने में सूजन और झिल्ली में सूखापन की समस्या बुजुर्गों में देखने को मिलती है। वहीं, यह समस्या अब 20 से 50 वर्ष के लोगों में भी मिल रही है। ऐसे मरीजों की आरए फैक्टर और एनटीसीसीपी जांच कराई जाती है, जिनमें 10 से 15 मरीजों में आरए फैक्टर पॉजिटिव मिल रहा है, जो कि गंभीर विषय है। एनटीसीसीपी पॉजिटिव आने पर मरीजों को अधिक परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता, वह नियमित इलाज से ठीक हो जाते है। उन्होंने बताया कि सब्जी व फल में मिलवाट और अशुद्ध खाना खाने से यह समस्या अधिक बढ़ गई है। डॉ.फहीम अंसारी ने बताया कि टाइफाइड, वायरल फीवर जैसी बीमारी की वजह से शरीर का इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। ऐसे में ऑटो इम्यूनिटी शरीर में डेवलप हो जाते है। यही सिस्टम जोड़ की झिल्ली के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने लगते है, जिससे जोड़ों में दिक्कत होने लगती है। इसलिए ऑटोइम्यून बीमारी का पता लगाने के लिए मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री की जानकारी लेने के साथ ही फिजिकल एग्जामिनेशन भी किया जाता है। इसके बाद खून में ऑटो एंटीबॉडीज का पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट कराया जाता हैं।

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