September 6, 2026

· प्रदेश के लिए नहीं खेले, फिर भी कोच-मैनेजर बनने का रास्ता आसान—चयन प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल

संवाददाता
कानपुर। उत्तर प्रदेश क्रिकेट में खिलाड़ियों के चयन को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन अब टीमों के सपोर्टिंग स्टाफ के चयन की प्रक्रिया भी चर्चा के घेरे में है। आरोप है कि प्रदेश की विभिन्न आयु वर्ग की टीमों में कोच, मैनेजर और अन्य सपोर्टिंग स्टाफ के चयन में योग्यता और प्रदर्शन से ज्यादा ‘सुपर सेलेक्टर’ की पसंद और वरदहस्त मायने रखता है। यही वजह है कि ऐसे चेहरों को भी जिम्मेदारियां मिल जाती हैं, जिनका प्रदेश की टीम का प्रतिनिधित्व करने का अनुभव तक नहीं रहा।ट्रायल से टीम तक ‘कृपा’ का खेल? प्रदेश के सौरभ दुबे की लगातार ऑब्जर्वर ड्यूटी पर उठे सवाल, यूपी की टीमों में ध्रुव सिंह और सौरभ दुबे को लगातार मिल रही जिम्मेदारियों से चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लगे हैं।उत्तर प्रदेश क्रिकेट में प्रतिभाओं की तलाश के लिए होने वाले ट्रायल मैचों की व्यवस्था और उनमें जिम्मेदारियां तय किए जाने को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। सूत्रों के मुताबिक, लगभग हर ट्रायल मैच में सौरभ दुबे की ऑब्जर्वर के रूप में लगातार ड्यूटी लगाई जा रही है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए बार-बार एक ही नाम पर भरोसा क्यों जताया जा रहा है?यूपीसीए के सूत्र बताते हैं कि मामला केवल ऑब्जर्वर की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं है। जानकारी के अनुसार ध्रुव सिंह अंडर-19 टीम के हेड कोच और सौरभ दुबे अंडर-19 के बैटिंग कोच रहे हैं। इसके अलावा सौरभ दुबे को अंडर-16 टीम में भी हेड कोच की जिम्मेदारी मिलने की बात सामने आई है। सत्र 2024-25 और 2025-26 में भी इन दोनों की भूमिकाओं को लेकर क्रिकेट जगत में चर्चा रही है।
सबसे बड़ा सवाल ध्रुव सिंह की पृष्ठभूमि को लेकर है। बताया जाता है कि ध्रुव सिंह ने उत्तर प्रदेश की ओर से क्रिकेट नहीं खेला, बल्कि हरियाणा और हिमाचल प्रदेश की तरफ से खेल चुके हैं। इसके बावजूद पिछले करीब तीन वर्षों से उत्तर प्रदेश की आयु वर्ग टीमों में उन्हें लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती रही हैं। इससे क्रिकेट से जुड़े लोगों के बीच यह चर्चा तेज है कि आखिर उत्तर प्रदेश के खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों के बीच जिम्मेदारियां बांटने का आधार क्या है?
सूत्रों के मुताबिक, टीमों के सपोर्टिंग स्टाफ के चयन में एक प्रभावशाली चयनकर्ता की भूमिका बेहद अहम रहती है। जिस पर ‘सुपर सेलेक्टर’ की नजरें मेहरबान हुईं, उसके लिए कोच या मैनेजर बनने का रास्ता आसान हो जाता है। फिर संबंधित व्यक्ति ने प्रदेश की क्रिकेट खेली हो या नहीं, इससे चयन प्रक्रिया पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। सवाल यही है कि जब खिलाड़ियों को टीम में जगह देने के लिए प्रदर्शन, फिटनेस और क्रिकेटिंग रिकॉर्ड को कसौटी बनाया जाता है तो सपोर्ट स्टाफ के मामले में यही कठोर मापदंड क्यों नहीं अपनाए जाते?
सबसे बड़ा सवाल तो इसके बाद सामने आता है। यदि चयनित सपोर्ट स्टाफ इतना सक्षम है तो मैदान पर टीमों का प्रदर्शन लगातार निराशाजनक क्यों नजर आ रहा है? कई आयु वर्ग की टीमों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बावजूद वही चेहरे बार-बार अलग-अलग जिम्मेदारियों में दिखाई देने की चर्चा है। कहीं कोच की भूमिका, कहीं मैनेजर की जिम्मेदारी और कहीं दूसरी टीम के साथ सपोर्ट स्टाफ का हिस्सा—जिम्मेदारियों का यह चक्र चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।
क्रिकेट जानकारों का कहना है कि सपोर्टिंग स्टाफ केवल टीम के साथ यात्रा करने वाला समूह नहीं होता। कोच खिलाड़ियों की तकनीक और मानसिक मजबूती तैयार करता है, जबकि मैनेजर टीम के अनुशासन और व्यवस्थाओं की महत्वपूर्ण कड़ी होता है। ऐसे में इन पदों पर नियुक्ति योग्यता, अनुभव, पूर्व प्रदर्शन और परिणामों के आधार पर होनी चाहिए।
विडंबना यह है कि टीम के खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी अक्सर खिलाड़ियों के सिर डाल दी जाती है, लेकिन सपोर्ट स्टाफ के चयन और उसकी जवाबदेही पर उतनी गंभीरता से सवाल नहीं उठते। यदि किसी को लगातार अवसर मिल रहे हैं और उसके कार्यकाल में टीम परिणाम देने में नाकाम है तो उसके प्रदर्शन का भी मूल्यांकन होना चाहिए।अब जरूरत इस बात की है कि यूपीसीए सपोर्टिंग स्टाफ चयन की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाए और यह स्पष्ट करे कि कोच-मैनेजर बनने के लिए वास्तविक कसौटी क्या है—योग्यता या ‘सुपर सेलेक्टर’ की सिफारिश? आखिर प्रतिभाओं की तलाश करने वाली व्यवस्था में अगर जिम्मेदारियां भी पसंद-नापसंद से तय होंगी तो मैदान पर बेहतर नतीजों की उम्मीद कैसे की ?इस मामले में यूपीसीए के अधिकारियों का पक्ष जानने की कोशिश की गई वो सफल नहीं सकी।

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