• गली-गली बिखरी है ग्रामीणों की नाराज़गी

आज़ाद समाचार ब्यूरो
बिशधन, बिल्हौर (कानपुर नगर)। तारीफ़ उनकी जो सफ़ाई के गीत गाते हैं, मगर हकीकत तो नयानिवादा की गलियों में कीचड़ और कूड़े के ढेर के बीच दब कर रह गई है। ककवन क्षेत्र के इस गांव की आंतरिक गलियाँ आज किसी रास्ते से कम और किसी दलदल से ज्यादा नज़र आती हैं, जहाँ हर कदम पर ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ रही हैं।
गांव के बच्चे, बुज़ुर्ग और बीमार लोग जिन गलियों से गुज़रने को मजबूर हैं, वहाँ न तो पैर रखने की जगह बची है और न ही साँस लेने की फिज़ा। गंदगी का पानी, कीचड़ और फैला कूड़ा—यह तस्वीर है नयानिवादा की, जहां सफाई व्यवस्था को लेकर ग्रामीणों का गुस्सा अब सब्र की सीमा पार कर चुका है।
जितेंद्र कुमार, रामनिवास, सुरेश कुमार, रजनीश कुमार सहित तमाम ग्रामीणों ने बताया कि उनकी पीड़ा सालों पुरानी है, लेकिन ग्राम प्रधान तक आवाज़ पहुँचाने के बावजूद उसे गंभीरता से नहीं लिया गया। ग्रामीणों का आरोप है— “हमने जितनी बार शिकायत की, उतनी बार हमें सिर्फ टाला गया। अब तो हालत ये है कि बारिश के बाद तो गलियाँ नदी-नाले से बदतर हो जाती हैं।”
गांव ग्राम पंचायत कसिगंवाँ के अंतर्गत आता है, जो पांडव नदी के पार बसा है। ग्रामीणों की मानें तो यही भौगोलिक दूरी उनके गांव की उपेक्षा की सबसे बड़ी वजह बन गई है। उनका कहना है— “हम नदी के इस पार हैं, अफसरों का ध्यान उस पार। नतीजा, हमारी गलियाँ आज ‘गंदगी की मिसाल’ बन चुकी हैं, जबकि बच्चे स्कूल जाते वक्त गिर-गिर कर संभलते हैं और बुज़ुर्गों के लिए तो घर से बाहर निकलना मुहाल हो गया है।”
जब इस मामले में एडीओ पंचायत बाबू सिंह यादव से बात की गई, तो उन्होंने समस्या को स्वीकार तो किया, लेकिन उनका जवाब भी उतना ही ‘ठंडा’ रहा जितनी सर्दियों में गांव की गलियाँ। उन्होंने कहा कि “गांव में अव्यवस्था थी, लेकिन ग्राम पंचायत कार्ययोजना के तहत गलियों का निर्माण कराया जा रहा है और कुछ काम क्षेत्र पंचायत निधि से हो रहा है।”
गौरतलब है कि यह वही ‘कार्ययोजना’ है, जिसका हवाला देकर अफसर सालों से ग्रामीणों को टालते आ रहे हैं। ग्रामीणों का तंज़ है— “उनकी ‘जल्द ही’ और हमारी ‘गंदगी’—दोनों ही पुरानी हो चुकी हैं।”
ग्रामीण अब केवल आश्वासनों पर विश्वास नहीं करते। उन्हें डर है कि कहीं यह मामला भी उसी ‘कागज़ी कार्रवाई’ की तरह न रह जाए, जो अक्सर फाइलों में दब जाती है। उनका सवाल साफ है— “जब तक अधिकारी खुद इन गलियों में चल कर नहीं देखेंगे, तब तक ये हालात नहीं बदलेंगे। हमें ठोस कार्रवाई चाहिए, न कि महीनों बाद मिलने वाली खाली बातें।”
इस बीच, एडीओ पंचायत ने यह ज़रूर कहा कि “जल्द ही गांव की व्यवस्था दुरुस्त कर दी जाएगी,” लेकिन जिस कीचड़ और गंदगी ने गांव की रौनक छीन रखी है, उसे साफ करने के लिए ज़मीनी स्तर पर पहल की दरकार है—न कि सिर्फ बयानों की बौछार।
नयानिवादा की यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि ग्रामीण प्रशासन की उस मानसिकता की पोल खोलती है, जहां सुविधाएं ‘वादे’ और ‘हकीकत’ के बीच झूलती रहती हैं। अब देखना ये है कि क्या इस बार एडीओ साहब की ‘जल्द’ का मतलब कुछ और होगा, या फिर ग्रामीणों को इसी कीचड़ में जीवन गुज़ारने की आदत डाल लेनी चाहिए। जनता की उम्मीदें बार-बार धोखा खा चुकी हैं—अब सियासत नहीं, साफ-सफाई चाहिए।






