June 30, 2026

रिसर्च में हुए खुलासे के बाद अब बदलेगा ‘ड्रग प्लान’।

संवाददाता
कानपुर।
बैक्टीरिया, वायरस और फंगस के खुद को दवाओं के खिलाफ ढाल लेने की वजह से अब इंसानों की तरह जानवरों पर भी दवाइयों ने असर करना बंद कर दिया है। कानपुर प्राणि उद्यान से कुछ ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जू में रहने वाले वन्यजीवों को पेट के कीड़े मारने के लिए जो दवाएं दी जा रही थीं, अब परजीवी उनके आदी हो चुके हैं। आसान भाषा में कहें तो इन कीड़ों ने दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है।
हाल ही में हुई एक रिसर्च की शुरुआती सैंपलिंग में बार्किंग डियर, सांभर और चीतल जैसे वन्यजीवों के मल में राउंडवॉर्म और फ्लैटवॉर्म जैसे खतरनाक परजीवियों के अंडे और लार्वा पाए गए हैं। इसके बाद अब जू प्रशासन वन्यजीवों का ‘ड्रग प्लान’ बदलने की तैयारी में है।
कानपुर जू के वन्यजीव चिकित्सक डॉ. नासिर ने बताया कि, यहाँ रहने वाले जानवरों की सेहत की नियमित जाँच की जाती है। पहले जहाँ सामान्य स्लाइड विधि से जाँच होती थी। वहीं,अब मथुरा वेटरनरी कॉलेज के छात्रों के सहयोग से एडवांस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
इसमें ‘डायरेक्ट स्लाइड’, ‘फ्लोटिंग’ और नमक के घोल वाली ‘कंसंट्रेशन मेथड’ जैसी तकनीकों से वन्यजीवों के मल की बारीकी से जाँच की जा रही है। इसी एडवांस टेस्टिंग में यह बात पकड़ में आई कि हर छह महीने में दवा बदलने के बावजूद कुछ जीवों के पेट में कीड़े मौजूद हैं।
डॉ. नासिर ने इसे आम बोलचाल की भाषा में समझाते हुए कहा, “जैसे पहले साधारण धुएं से भी मच्छर भाग जाते थे, लेकिन अब उन पर ऑल-आउट या फास्ट कार्ड का भी असर नहीं होता क्योंकि मच्छरों ने दवाओं के खिलाफ रेजिस्टेंस बना लिया है। ठीक यही बात जू के परजीवियों  पर भी लागू हो रही है।
इन जानवर को दवा तो दी जा रही है, लेकिन पेट के कीड़े अब चालाक हो चुके हैं, उन पर इन दवाओं का असर होना बंद हो गया है।” जू में आमतौर पर फेनबेंडाजोल, आइवरमेक्टिन, एलबेंडाजोल, प्राजीक्वेंटल और पायरेन्टल पामोएट जैसी जानी-मानी दवाएं कॉम्बिनेशन में दी जाती हैं, लेकिन अब ये बेअसर साबित हो रही हैं।
कानपुर जू की इन्वेंट्री के मुताबिक, यहाँ कुल 105 प्रजातियों के करीब 1309 वन्यजीव और पक्षी हैं। फिलहाल करीब 50 से 60 जानवरों की सैंपलिंग का काम पूरा हो चुका है। चूंकि हिरन जैसे जानवर झुंड में रहते हैं, इसलिए जू प्रशासन ग्रुप में रैंडम सैंपलिंग कर रहा है।
डॉ.नासिर का कहना है, कि एक बार जब सभी वन्यजीवों की सैंपलिंग का काम पूरा हो जाएगा, तब यह साफ हो पाएगा कि किस परजीवी पर कौन सी दवा बेअसर हुई है। इसके बाद पूरी रिपोर्ट तैयार कर इन कीड़ों को खत्म करने के लिए बिल्कुल नई और एडवांस ‘ड्रग ऑफ चॉइस’ लाई जाएंगी, ताकि जू के सभी बाड़े और बेजुबान पूरी तरह सुरक्षित रह सकें।