
संवाददाता
कानपुर। बीते एक दशक में उत्तर प्रदेश की क्रिकेट संरचना का स्वरूप तेजी से बदला है। कभी कानपुर, लखनऊ, झांसी, प्रयागराज और मेरठ मंडल के खिलाड़ी प्रदेश की विभिन्न आयु वर्ग की टीमों में बड़ी संख्या में प्रतिनिधित्व करते थे, लेकिन अब हालात बिल्कुल ही बदले दिखाई दे रहे हैं। यूपीसीए के कुछ पूर्व पदाधिकारियों का आरोप है कि वर्तमान समय में भाई के नाम से मशहूर सुपर सेलेक्टर की चयनकर्ता टीम को इन जिलों के क्रिकेटर्स अब फूटी आंख नहीं सुहा रहे। यूपीसीए के आका के चयनकर्ताओं का झुकाव और लगाव प्रदेश के एक ही क्षेत्र, विशेष रूप से सहारनपुर मंडल के खिलाड़ियों की ओर अधिक दिखाई दे रहा है। क्रिकेट जगत में ये चर्चा भी आम है कि यदि कोई चयनकर्ता, कोच, मैनेजर या पदाधिकारी किसी मुद्दे पर असहमति जताने की कोशिश करता है तो उसे संगठन में हाशिये पर डाल दिया जाता है। कई पूर्व खिलाड़ियों और क्रिकेट प्रशासकों का कहना है कि संघ के भीतर ऐसा माहौल बन गया है जिसमें निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति निर्वाचित पदाधिकारियों के बजाय कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित हो चुकी है जिसका समर्थन करना आज सभी की मजबूरी बन गयी है। उत्तर प्रदेश क्रिकेट जगत में इन दिनों एक बार फिर एक नाम चर्चा के केंद्र में है। प्रदेश क्रिकेट संघ (यूपीसीए) के भीतर लंबे समय से प्रभावशाली माने जाने वाले निजी सहायक (पीए) अकरम सैफी को लेकर क्रिकेट गलियारों में गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि चयन प्रक्रिया से लेकर विभिन्न समितियों और पदों पर नियुक्तियों तक उनकी दखलंदाजी इतनी बढ़ गई है कि कई पदाधिकारी और निदेशक भी खुलकर विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं।क्रिकेट से जुड़े सूत्रों का दावा है कि टीम चयन, सपोर्ट स्टाफ की नियुक्ति, विभिन्न समितियों के गठन और क्रिकेट संचालन से जुड़े अनेक मामलों में अकरम सैफी की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। हालांकि आधिकारिक रूप से संघ की ओर से कभी भी उनकी भूमिका को लेकर कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है, लेकिन क्रिकेट हलकों में उन्हें ‘सुपर पावर पीए’ के रूप में देखा जाता है।प्रदेश के कई जिलों के क्रिकेट प्रेमियों का कहना है कि यदि चयन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो फिर पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय संतुलन लगातार क्यों बिगड़ रहा है। उनका तर्क है कि प्रतिभा किसी एक मंडल या जिले की जागीर नहीं होती और प्रदेश के सभी क्षेत्रों के खिलाड़ियों को समान अवसर मिलने चाहिए।यूपीसीए के भीतर बढ़ती इन चर्चाओं ने संगठन की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि चयन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पूर्ण पारदर्शिता लाकर ही इन आरोपों और आशंकाओं को दूर किया जा सकता है। फिलहाल क्रिकेट जगत में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अकरम सैफी का प्रभाव इतना मजबूत कैसे हो गया कि उनके खिलाफ आवाज उठाने से भी लोग बचते नजर आ रहे हैं।






