July 6, 2026

संवाददाता
कानपुर। बाजार की खबरों को जब आम आदमी की थाली से तौला जाता है, तो हर उतार-चढ़ाव का एक अलग मतलब होता है। आज कानपुर के खाद्य बाजारों से ऐसी मिली-जुली तस्वीर सामने आई है, जिसमें राहत भी है और चिंता भी। एक ओर दालों के दामों में आई तेज गिरावट ने आम उपभोक्ता को उम्मीद दी है, तो वहीं चावल की बढ़ती कीमतों ने उसी उम्मीद पर पानी फेर दिया है। यह वह पल है जब कानपुर की गलियों में गृहणियाँ अपने बजट का फिर से हिसाब लगा रही हैं। क्या सस्ती दाल का फायदा उठाया जाए या महँगे चावल का बोझ झेला जाए?

हकीकत यह है कि इस हफ्ते शहर की थोक मंडियों में दालों की आवक अचानक बढ़ गई है। दरअसल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में इस बार दालों की पैदावार काफी अच्छी रही है, जिसका सीधा असर कानपुर की मंडियों पर पड़ा है। नई फसल की बोरियाँ जैसे ही मंडियों में पहुँचीं, थोक भावों ने नीचे की ओर रुख कर लिया। अरहर फूल दाल जो अब तक 108 रुपये किलो पर टिकी हुई थी, वह अब 103 रुपये पर आ गई है। अरहर स्पेशल की कीमत 92 से 88 रुपये, मूंग देसी 92 से 88 रुपये और उड़द दाल की कीमत जो 138 रुपये किलो पर बिक रही थी, वह सीधे 120 रुपये पर आ गिरी है। मूंग धोवा और उड़द धोवा में भी तीन-तीन रुपये किलो की कमी देखने को मिली है। थोक कारोबारी सचिन त्रिवेदी इसे उत्पादन बढ़ने का नतीजा बताते हैं और मानते हैं कि अगर आवक इसी तरह जारी रही तो आने वाले दिनों में थोक दाम और भी नरम पड़ सकते हैं।

लेकिन असली सवाल यह है कि जब थोक बाजार सस्ता हो रहा है, तो फिर फुटकर दुकानों पर दालें क्यों नहीं सस्ती हो रही हैं? इसका जवाब सीधा है, पुराना स्टॉक। फुटकर व्यापारी अभी भी वही माल बेच रहे हैं जो उन्होंने ऊँचे भाव पर खरीदा था। इसलिए आज अरहर दाल 120 रुपये, मूंग 110 रुपये और उड़द 140 रुपये किलो पर बिक रही है। फुटकर व्यापारी राजेश कुमार शुक्ला का कहना है कि पुराना माल खत्म होने में एक-दो दिन और लगेंगे, उसके बाद नए थोक भाव का असर फुटकर बाजार पर भी दिखने लगेगा। यानी अगर आप दो-तीन दिन और इंतजार करें, तो दालें और सस्ती मिल सकती हैं। बाजार के जानकारों का अनुमान है कि अगले चार-पाँच दिनों में अरहर 110-112 रुपये, मूंग 100-102 रुपये और उड़द 130-132 रुपये प्रति किलो के आसपास पहुँच सकती है।

मगर जहाँ दालों ने उम्मीद की किरण दिखाई है, वहीं चावल ने हालात बदल दिए हैं। ठीक उसी दिन जब दालों की गिरावट की खबर आई, चावल मंडी में ऐसा उछाल आया कि सभी चौंक गए। गुजराती चावल का थोक भाव 38 रुपये से सीधे 47 रुपये किलो पहुँच गया और सेला चावल जो 90-92 रुपये में बिकता था, वह अब 104 रुपये किलो पर बिकने लगा है। इसका मतलब यह हुआ कि जो परिवार महीने में दस किलो चावल खरीदता है, उसे करीब 140 रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे और यह बोझ कुछ ही दिनों में आया है। अगर दालों में आई बचत की बात करें, तो अगर कोई परिवार पाँच किलो अरहर दाल खरीदता है, तो उसे लगभग 40-50 रुपये की बचत होगी, लेकिन चावल पर आया यह बढ़ा हुआ खर्च उस बचत को पूरी तरह निगल जाता है। यही कारण है कि आज कानपुर के हर मोहल्ले में यही चर्चा है, दाल सस्ती हुई तो क्या, चावल ने पूरा हिसाब बिगाड़ दिया।

सवाल यह उठता है कि चावल के दाम इतनी तेजी से क्यों बढ़े? इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारण है, वह है यूरिया खाद को लेकर किसानों की बढ़ती चिंता। जब किसानों को नहीं पता होता कि आने वाले सीजन में उन्हें खाद मिलेगी या नहीं, तो वे फसल बोने में हिचकिचाते हैं और इस अनिश्चितता का असर सीधे मौजूदा बाजार भावों पर पड़ता है। कारोबारी भी भविष्य में और महँगाई की आशंका में अभी से माल ऊँचे दाम पर बेच रहे हैं। इसके अलावा, इस बार मानसून ने भी साथ नहीं दिया है। दक्षिण और पूर्वी भारत के चावल उत्पादक इलाकों में मानसून कमजोर रहा है, जिससे धान की बुआई प्रभावित हुई है और आने वाले महीनों में उत्पादन कम होने की आशंका बढ़ गई है। कानपुर के माल गोदाम और रेलवे स्टेशन के आसपास के थोक बाजारों में भी चावल के स्टॉक में कमी देखी जा रही है, जिसने कारोबारियों के बीच हड़कंप मचा दिया है। कुछ व्यापारी तो नया माल खरीदने में भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। विशेषज्ञों की मानें तो अगले दस-पंद्रह दिनों में अगर मानसून ने दस्तक नहीं दी या खाद वितरण पर कोई स्पष्टीकरण नहीं आया, तो चावल और पाँच-दस प्रतिशत महँगा हो सकता है।

— बढ़ती घटती कीमतों के उलटफेर का दंश झेल रहा दिहाड़ी मज़दूर

इस उलटफेर का दंश सबसे ज्यादा किसे झेलना पड़ रहा है, तो सबसे पहले नाम आता है दिहाड़ी मजदूरों का। उनके लिए चावल सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि जीवन की मूल जरूरत है। जब चावल महँगा हो जाता है, तो उनकी पूरी थाली बिखर जाती है। दाल चाहे सस्ती हो जाए, मगर बिना चावल के तो थाली अधूरी ही रहती है। वहीं मध्यमवर्गीय परिवारों पर भी यह बोझ बड़ा भारी पड़ रहा है क्योंकि उनका हर महीने का बजट एक निश्चित सीमा में बंधा होता है, और कोई भी अतिरिक्त खर्च उन्हें अपनी अन्य जरूरतों में कटौती करने पर मजबूर कर देता है।

कानपुर के ग्वालटोली, चमनगंज, बाबूपुरवा, बेकनगंज और किदवई नगर जैसे कई इलाकों में गृहिणियाँ इन दिनों पहले से ज्यादा सजग हो गई हैं। श्याम नगर निवासी प्रिया शुक्ला जी ने बताया की महगाई के इस दौर में कब किस खाद्य पदार्थ की कीमत कितनी बढ़ जाए कुछ कहा नही जा सकता हैं ये एक राहत की खबर है की दालों के दामों में गिरावट आई है कई राज्यों में अधिक पैदावार की वजह से यह हुआ है लेकिन चावल के दामों में भारी बढ़ौतरी एक चिंता का विषय भी है। देखा जाए तो मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए कोई राहत नहीं है, एक तरफ दाल के दामों में गिरावट तो है लेकिन चावल की बढ़ती कीमत उसे बराबर कर रही है। आरती सिंह, जो ग्वालटोली में रहती हैं, बताती हैं कि पंद्रह दिन पहले जहाँ पाँच किलो चावल 450 रुपये में आ जाता था, वहीं आज वही चावल 520 रुपये में मिल रहा है। वे कहती हैं कि दाल भले ही 20 रुपये किलो सस्ती हो, लेकिन चावल तो रोज़ का भोजन है और उसके बढ़े हुए दाम ही तय करेंगे कि महीने का खर्च कैसे चलेगा। नई सड़क की रहने वाली शाज़िया मंसूर भी लगभग यही बात दोहराती हैं, उन्होंने सोचा था कि दालों के सस्ता होने से महीने का कुछ खर्च बचेगा, लेकिन अब चावल की तेजी ने सारा हिसाब बिगाड़ दिया है।

इन हालातों में उपभोक्ता जिस तरह की रणनीति अपना रहे हैं, वह अपने आप में दिलचस्प है। कुछ परिवारों ने दालों की खरीदारी को दो-तीन दिन के लिए टाल दिया है, ताकि फुटकर बाजार में नए सस्ते भाव आने का इंतज़ार कर सकें। वहीं चावल को लेकर उलटी तस्वीर है, कई परिवार यह सोचकर कि कीमतें और बढ़ेंगी, अभी से एक-दो महीने का चावल खरीदने लगे हैं, जिससे बाजार में मांग और बढ़ गई है। कुछ परिवार महँगे सेला चावल की बजाय सामान्य किस्म का चावल खरीद रहे हैं या पुराने स्टॉक का सहारा ले रहे हैं। यह एक ऐसा दौर है जब हर घर में खर्च और बचत का नया समीकरण बन रहा है, और हर गृहिणी अपनी रसोई की किताब को नए सिरे से लिख रही है।

बाजार की बात करें, तो दाल कारोबारियों का मूड फिलहाल सकारात्मक है। उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में और भी आवक आएगी और दाम नीचे ही रहेंगे। लेकिन चावल कारोबारी फिलहाल सतर्क और कुछ हद तक घबराए हुए हैं। चावल कारोबारी विमल अग्रवाल कहते हैं कि अभी नए माल की बुकिंग में जोखिम है क्योंकि स्टॉक कम है और आने वाली फसल के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। अगर मानसून ने कुछ और दिन साथ नहीं दिया, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। रावतपुर मंडी में दालों की बोरियों के ढेर के बीच चावल गोदामों में सन्नाटा पसरा है, कई कारोबारी तो अभी खरीद-फरोख्त पूरी तरह रोककर बैठ गए हैं।

इस बीच, आम उपभोक्ता की नज़र प्रशासन पर भी है। लोग चाहते हैं कि सरकार यूरिया की उपलब्धता को लेकर तुरंत स्पष्टता दे ताकि किसानों और बाजार दोनों की चिंता कम हो। केंद्र सरकार से उम्मीद है कि वह अपने बफर स्टॉक से चावल बाजार में छोड़े, ताकि थोक बाजार में कीमतें नियंत्रित हो सकें। साथ ही, फुटकर कारोबारियों पर भी नज़र रखी जानी चाहिए ताकि कोई अनुचित मनमानी न हो। यह चर्चा खबरों के दायरे से निकलकर आम जनता की व्यथा बन चुकी है।

असल में देखा जाए तो आज की यह तस्वीर हमें एक बड़ी सच्चाई याद दिलाती है, जरूरी वस्तुओं की कीमतें कभी एक दिशा में नहीं चलतीं। एक चीज़ सस्ती होती है तो दूसरी उसकी भरपाई करने के लिए महँगी हो जाती है। और इसी बीच आम आदमी अपनी थाली का संतुलन बनाए रखने के लिए संघर्ष करता रहता है। फिलहाल कानपुर की नज़र दो चीज़ों पर है, पहली, क्या मानसून मेहरबान होगा और दूसरी, क्या सरकार खाद और बाजार नियंत्रण के लिए कोई ठोस कदम उठाएगी। तब तक, हर घर अपनी रसोई में नए-नए फॉर्मूले आजमाता रहेगा, कम चावल, थोड़ी अतिरिक्त दाल, कुछ सब्जी, और बचत का कोई नया तरीका। लेकिन क्या यह फॉर्मूला हर घर में काम करेगा? शायद नहीं। क्योंकि हर थैले की अपनी सीमा होती है, हर रसोई का अपना बजट होता है।

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