July 12, 2026

ओसामा रसूल
कानपुर।
रविवार को कानपुर हरियाली के एक ऐसे महाअभियान का गवाह बनेगा, जिसके आंकड़े भले ही चकाचौंध कर दें, लेकिन सवाल वही पुराना है, जिन पेड़ों को हमने खोया, क्या वे कभी वापस आएंगे? जनपद के 500 से अधिक स्थलों पर 35 लाख 84 हजार 556 पौधे रोपे जाएंगे, सात थीम वन बनेंगे, 51 गोकुल वाटिकाएं विकसित होंगी, गंगा बैराज से मंधना तक अमलतास के पेड़ों की कतारें खिलेंगी, और सीएसए विश्वविद्यालय में सुबह नौ बजे कैबिनेट मंत्री राकेश सचान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे। प्रशासन ने जियो-टैगिंग, नोडल अधिकारी, विभागवार लक्ष्य, हर चीज़ को बारीकी से साध लिया है, और डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह व सीडीओ अभिनव जैन ने ‘एक पेड़ मां के नाम’ का आह्वान कर हर नागरिक से संरक्षण का संकल्प मांगा है, जो सराहनीय है क्योंकि बिना ममता के लगा पौधा, बिना निगरानी के मुरझा ही जाता है, पर इस भव्य आयोजन के बीच एक तीखा सवाल वही है जो हर बार अनुत्तरित रह जाता है। जिन हजारों हरे-भरे वृक्षों को बीते सालों में लगातार कानपुर की सड़कों, कॉलोनियों और बाजारों से बिना सोचे-समझे विकास के नाम पर काटा गया, क्या उनकी गिनती कभी इस आंकड़े में जुड़ेगी? शहर के बीचोंबीच विकास के नाम पर जिन पीपल, बरगद, महुआ और अन्य के वृक्षों को चीर-फाड़कर हटाया गया, कटे वृक्ष या तो ज़मीन पर ठूंठ बनकर पड़े हैं, या बुरी तरह बिखरकर मिट गए हैं, दोनों ही सूरत में उनकी कोई पहचान नहीं बची। जिनकी छांव में पीढ़ियां पली थीं, वे आज सिर्फ धूल बनकर रह गए। आंकड़ों की बात करें तो वन विभाग 8.55 लाख पौधे लगाएगा, ग्राम्य विकास को 13.06 लाख का लक्ष्य है, और कृषि, पर्यावरण, नगर विकास, पंचायती राज व राजस्व विभाग मिलकर बाकी लक्ष्य पूरा करेंगे, वहीं वंदे मातरम् वाटिका, ऊर्जा वन, महर्षि चरक वन, सामाजिक समरसता वन, समृद्धि वन, ऑक्सी वन और फलदार वाटिका। ये सात थीम वन अपने नामों से बड़ी उम्मीदें जगाते हैं, पर क्या इनका रखरखाव उतना ही बड़ा होगा जितना बड़ा इनका शिलान्यास, और क्या किसी योजना में यह बराबरी का हिसाब है।

विकास के नाम पर काटे गए वृक्षों का नहीं कोई हिसाबदार

एक पुराना पीपल कितने नए पौधों के बराबर, क्या कलम और नीम के बच्चे, जो आज लगेंगे, उन सदियों पुराने वृक्षों की कार्बन-क्रेडिट, जैव-विविधता और भावनात्मक विरासत की भरपाई कर सकेंगे, क्या किसी ने जनता से पूछा, क्या किसी ने गिनती की, क्या किसी ने मुआवज़े का प्रावधान किया, हर कटे पेड़ के बदले कितने पौधे लगाए जाने चाहिए इसका कोई सूत्र नहीं है, हर पुराने वृक्ष की कार्बन सोखने की क्षमता का कोई हिसाब नहीं लगा, हर पेड़ की जैव-विविधता में भूमिका का कोई मूल्यांकन नहीं हुआ, और पेड़ों को ‘अड़चन’ मानने वाली मानसिकता पर कोई रोक नहीं लगी, यह सिर्फ पौधारोपण का मामला नहीं है बल्कि हमारी पहचान, हमारी विरासत और हमारी ज़िम्मेदारी का सवाल है। वो पीपल जिसके नीचे दादी कहानियाँ सुनाया करती थीं, वो बरगद जिसकी जटाओं में पक्षियों के घोंसलों का सुरक्षित स्थान होता था, वो आम जिसके फलों की मिठास पूरे मोहल्ले में बिखरती थी, क्या इनका कोई मोल नहीं, हाँ अमलतास के पीले फूलों की कतारें खूबसूरत लगेंगी और गोकुल वाटिकाएं गायों को छाया देंगी, पर तब तक के लिए जब तक शहर के विकास के नक्शे में पेड़ों को अड़चन न माना जाए और जब तक हर कटान के बदले अनुपातिक हरियाली सुनिश्चित न हो, यह महाअभियान आधा-अधूरा ही रहेगा, और इसलिए हमें मांग करनी चाहिए। हर कटे पेड़ का डेटाबेस, कितने कहाँ कब किसने काटा, हर कटान के लिए मुआवज़ा योजना, एक पुराना पीपल बराबर 100 नए पौधे और उनका 5 साल रखरखाव, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को सार्वजनिक किया जाए और आम जनता की सहमति अनिवार्य हो, पुराने पेड़ों की सुरक्षा के लिए क़ानून बने और बिना अनुमति कटान पर भारी जुर्माना हो, नए पौधों की मॉनिटरिंग हो और हर पौधे की जियो-टैगिंग के साथ समय-समय पर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, और स्कूलों-कॉलेजों को जोड़ा जाए ताकि हर पौधे को गोद देने की परंपरा बने, क्योंकि एक आज का नीम सौ कल के पीपलों का विकल्प कभी नहीं हो सकता, 35 लाख पौधे एक स्वप्निल संख्या है लेकिन जिस मिट्टी में उन्हें लगाया जा रहा है उस मिट्टी को पहले उन पुरानी जड़ों के मरने का गम पचाना होगा, इसलिए पौधा लगाएं ज़रूर लगाएं लेकिन कटान पर रोक की भी उतनी ही जोरदार आवाज उठाएं, सिर्फ औपचारिकता के लिए नहीं बल्कि अपनी अगली पीढ़ी के लिए, क्योंकि हरियाली सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं यह हमारी सांसों का सवाल है, जो पेड़ कटता है वह सिर्फ एक पेड़ नहीं कटता। उसके साथ एक कहानी, एक छांव, एक पहचान और कई पीढ़ियों की यादें मिट जाती हैं, नए पौधे लगाना अच्छी बात है लेकिन कटे हुए वृक्षों का हिसाब मांगना भी उतना ही ज़रूरी है, और अब यह सवाल कानपुर के हर नागरिक के सामने है। क्या आप इसका जवाब देने को तैयार हैं?