• जिस बिल्डिंग को प्रवर्तन ने अवैध बता थमाया नोटिस एक साल बाद उसको बता दिया 20-25 साल पुरानी इमारत।

संवाददाता
कानपुर। जिस शहर की पहचान औद्योगिक राजधानी के रूप में हो, उसी कानपुर नगर में आज अवैध निर्माणों का साम्राज्य खड़ा हो चुका है। एक ओर जहां केडीए का बुलडोजर अवैध निर्माणों पर चलता दिखता है, वहीं दूसरी ओर इसी विभाग के भीतर बैठे प्रवर्तन अनुभाग के क्षेत्रीय
भ्रष्ट अधिकारी बिल्डरों के साथ मिलकर इन्हीं अवैध निर्माणों को संरक्षण देते दिखाई दे रहे हैं। करोड़ों की जमीन पर चल रहे अवैध निर्माणों के पीछे जहां बिल्डरों का खेल निरंतर जारी है, वहीं इसे रोकने में केडीए
के क्षेत्रीय अधिकारियों की लगातार बरती जा रही लापरवाही और भ्रष्टाचार ने शहर को अवैध इमारतों का कब्रिस्तान बना दिया है।

बताते चलें कि नगर के चमनगंज क्षेत्र स्थित प्रेम नगर में 105/196 और 105/196 ए दो अलग-अलग भूखंडों पर बिल्डर ने लगभग 1200 वर्गगज में निर्माण कर बेसमेंट बनाया है जो पूरी तरह से अवैध व गैरकानूनी प्रतीत होता हैं । यही नहीं इसके साथ ही भूतल समेत 6 तलों का तेज गति से बिल्डर नूर आलम निर्माण करा रहा है, जबकि विकास प्राधिकरण का प्रवर्तन दस्ता घोर लापरवाही कर आंख मूंदे नजर आ रहा है।

नाम न छापने की शर्त पर एक छोटे बिल्डर ने बताया कि केडीए के भ्रष्ट तंत्र में निर्माण कराने से पूर्व केडीए के प्रवर्तन दस्ते के भ्रष्ट कनिष्ठ अभियंताओं, अवर अभियंताओं और संबंधित अधिकारियों से सांठगांठ की जाती है, और उन निर्माणों को ही चिन्हित कर कार्रवाई की जाती है। कार्रवाई के बाद चार गुना शुल्क फाइल दबाने के नाम पर वसूला जाता है। जबकि नगर में अनेकों इमारतें ऐसी भी हैं जो मात्र फाइलों में ही सील हैं। यदि उन इमारतों का भौतिक निरीक्षण कर सत्यापन किया जाए, तो वहां परिवारों सहित लोग आश्रित हैं। यदि इन इमारतों के संबंध में किसी माध्यम से शिकायत की जाती है, तो अधीनस्थ निरीक्षण कर उच्चाधिकारियों को गुमराह करते हुए भ्रामक आख्या लगाते हैं कि इमारत का निर्माण 20 से 25 वर्ष पूर्व किया गया है। जबकि हाल ही में मिली शिकायतों के अनुसार लगाए गए आरोपों का लगभग सत्यापन भी किया जा सकता है।
केडीए के पत्र में अवैध निर्माण न होने की भी बात कही गई है। निरंतर शिकायत करने पर भ्रष्ट अधिकारियों पर उदासीनता की गई और निर्माण जारी रहा। ठीक एक वर्ष बाद पुनः शिकायत पर निर्माण को 20 से 25 वर्ष पूर्व निर्मित बताया गया।
जिस पर सक्षम अधिकारियों की चुप्पी और नाममात्र कार्यवाही पर तिलमिलाए छोटे बिल्डरों में यह भी चर्चा का विषय है कि जो बड़े बिल्डर 1200 वर्गगज में अवैध रूप से बेसमेंट समेत अपार्टमेंट बना रहे हैं, उन पर कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है। नगर के घनी आबादी वाले क्षेत्र में कुछ इमारतें ऐसी भी हैं जिनके प्रपत्रों में स्वामित्व पर भी सवालिया निशान हैं। इनमें जोन-1 स्थित इफ्तिखाराबाद, नई सड़क, मछलीटोला मूलगंज और बांसमंडी समेत कई क्षेत्र शामिल हैं।
बड़े बिल्डर जो सांठगांठ कर अवैध निर्माण कर रहे हैं, उन पर कार्रवाई सिर्फ नाममात्र की जाती है, जबकि छुटभैये बिल्डर जो भ्रष्ट तंत्र में अपना सामंजस्य नहीं बना पा रहे, उनके अवैध निर्माणों पर ऐक्शन लिया जाता है। हालांकि दोनों ही सूरत में अवैध निर्माण पर अंकुश लगाने में प्राधिकरण असफल होता नजर आ रहा है।
अग्निशमन मानकों की अनदेखी, नक्शे की धज्जियां, सेटबैक और खुली जगह की अनुपस्थिति और संकरी गलियों में खड़ी हो रही बहुमंजिला अवैध इमारतें। बिल्डर बेखौफ हैं, क्योंकि उन्हें भलीभांति पता है कि अग्निशमन विभाग और विकास प्राधिकरण की अनदेखी उनके पक्ष में काम कर रही है। जहां फायर एनओसी नहीं, वहां छह-सात मंजिला इमारतें, जहां अग्निशमन उपकरण नहीं, वहां सैकड़ों परिवार, और जहां सुरक्षित निकासी का रास्ता नहीं, वहां आपदाओं का जाल तैयार है।
जबकि राष्ट्रीय भवन संहिता, राज्य नगर निगम अधिनियम और अग्निशमन अधिनियम साफ कहते हैं कि बहुमंजिला इमारतों के लिए निर्माण से पहले फायर एनओसी, निर्माण के दौरान नियमित जांच और बाद में ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट अनिवार्य है। लेकिन जमीन पर क्या हो रहा है? नक्शा पास नहीं, फायर एनओसी नहीं, फिर भी बिजली-पानी के कनेक्शन बड़ी आसानी से मिल जाते हैं। न सेटबैक, न सीढ़ियों की चौड़ाई, न अग्नि-प्रतिरोधी दरवाजे, न स्प्रिंकलर, न हाइड्रेंट, न टेरेस तक पहुंच। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अग्निशमन विभाग और विकास प्राधिकरण आखिर किस मोर्चे पर तैनात हैं? और सबसे बड़ा सवाल, जिन भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से ये अवैध इमारतें लगातार खड़ी हो रही हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होती? अगर हर इमारत का नक्शा, एनओसी और ओसी सार्वजनिक कर दिया जाए, तो अधिकांश इमारतों में किसी प्रकार की कोई एनओसी नहीं होगी। यदि ऐसा किया जाता है तो पारदर्शिता से बिल्डरों का खेल और प्रशासन की लापरवाही दोनों उजागर होंगे।
नगरवासियों को जागरूक होने की आवश्यकता है। अग्निशमन मानक केवल कागजी औपचारिकता नहीं, जीवन रक्षा की पहली कड़ी है। जब संकरी गली में आग लगती है, तब फायर ब्रिगेड की गाड़ी घंटों नहीं पहुंच पाती। ऊंची इमारतों तक सीढ़ी नहीं पहुंचती। पानी का स्रोत नहीं मिलता। ऐसे में लोग खिड़कियों से छलांग लगाने को मजबूर होते हैं।
आग दुर्घटना नहीं एक प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम होती है। जब तक अग्निशमन विभाग और विकास प्राधिकरण बिल्डरों की मुहर बनकर काम करेंगे, तब तक नगर में अवैध बहुमंजिला इमारतें खड़ी होती रहेंगी और मासूम लोग मौत के मुंह में धकेले जाते रहेंगे।





