October 5, 2026

संवाददाता
कानपुर। यूपीसीए की एजीएम में उपाध्यक्ष राकेश मिश्रा द्वारा संघ के कामकाज को लेकर लगाए गए आरोपों पर कई सवाल खड़े हुए। आरोप लगाना आसान है, लेकिन किसी संवैधानिक संस्था पर गंभीर आरोप लगाने से पहले तथ्यों और संबंधित नियमों की पूरी जानकारी होना आवश्यक है।

बैठक में कंपनी एक्ट और लोढ़ा समिति की सिफारिशों से जुड़े विषयों पर उनके द्वारा उठाए गए सवालों को लेकर भी आपत्तियां सामने आईं। यदि किसी विषय पर आपत्ति है तो उसे प्रमाणित तथ्यों और नियमों के आधार पर रखा जाना चाहिए, न कि अनावश्यक विवाद का रूप दिया जाना चाहिए।

राकेश मिश्रा पर अतीत में भी यूपीसीए के भीतर गुटबाजी को बढ़ावा देने और संघ के कामकाज पर अनावश्यक दबाव बनाने के आरोप लगते रहे हैं। टी-20 हो या राज्य की टीम, विभिन्न मौकों पर उनके विरोध और विवाद की स्थिति सामने आने की बात कही जाती रही है।

गाजियाबाद स्टेडियम के संबंध में भी सवाल उठाए गए। यूपीसीए द्वारा स्टेडियम के विकास में सहयोग दिए जाने के बावजूद उसके निर्माण और संचालन को लेकर लंबे समय से स्थिति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाई है। ऐसे में संघ पर एकतरफा आरोप लगाने के बजाय पूरे मामले के तथ्यों और जिम्मेदारियों को सामने रखना जरूरी है।

जहाँ तक उनके पुत्र से जुड़े आरोपों का प्रश्न है, बिना प्रमाण यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी व्यक्तिगत या पारिवारिक कारण से उन्होंने संघ के विरुद्ध रुख अपनाया। यदि इस संबंध में कोई दस्तावेजी तथ्य या सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध है, तो उसे अलग से प्रस्तुत किया जा सकता है।

संघ की आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन आलोचना तथ्यों, नियमों और प्रमाणों पर आधारित होनी चाहिए। व्यक्तिगत आरोपों और गुटबाजी के बजाय यूपीसीए के हित, खिलाड़ियों के हित और क्रिकेट के विकास को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
राकेश मिश्रा पूर्व मैं भी उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसियेशन को अस्थिर करने की कोशिश करते आ रहे है,व्यक्तिगत लाभ दिखता हैं।पहले वे दबाब बनाकर अपने पुत्र को रणजी कैम्पों का हिस्सा बनवाये है फिर येन केन प्रक्रेन टीमों में में डलवाते है।गत वर्ष बीसीसीआई को कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट का नोटिस भी प्राप्त हुआ।जिसके कारण उन्हें अपने पुत्र को टीम से हटवाना पड़ा।
यूपीपीएल टी 20 मैं भी जबरदस्ती अपने पुत्र को टीम पर थोपते आ रहे हैं।जिसका खामियाजा फ्रेंचाइजी और टीम को भुगतना पड़ता हैं।
यूपीसीए में गुटबाजी कर चुके हैं कुछ खास लोगो के साथ मिलकर दबाव का प्लान बनाते है। और बैठकों मैं पेट्रा आजमाकर सुर्खियों बटोरने का काम करना आदतों में शामिल हैं।
राजीव शुक्ला एवं अन्य पदाधिकारी,सदस्य , इस बात को भली भांति समझ रहे है।
मीटिंग मैं यह भी बताया गया की रिंकू,ध्रुव,भुवनेश्वर,जीशान,विराज,कार्तिक,प्रशांत जैसे अनुभवी एवं युवा प्रतिभाएं बढ़ रही हैं।
यूपीसीए को एक जुट हो कर काम करने के बजाए खुद का लाभ नहीं देखना चाहिए।
यदि राकेश मिश्रा चाहते तो पुत्र के भविष्य के लिए खुद को यूपीसीए से अलग कर अपने पुत्र को रणजी ट्रॉफी में खेलने देते।
यह भी विदित हैं कि उनके पुत्र खेल सामग्री का ऐड करने में ही लगे रहते हैं खेल से उन्हें अब कोई मतलब भी नहीं है।
यह भी देखने योग्य बात है की यूपीसीए मैं जिन पुराने खिलाड़ियों को अनुभवी बताया जा रहा हैं उनकी कोचिंग सफलताओं का कोई मजबूत आधार नहीं हैं।
आंकड़ों की बात करे तो सीनियर टीम के आंकड़े विपरीत दिखते हैं।
राकेश मिश्रा का यह तरीका सुर्खियों तक ही दिखता है, एक पूर्व खिलाड़ी जो रणजी का कप्तान भी रह चुका हैं और यूपीसीए से लेकर खिलाड़ियों और कोचों,स्टाफ की पसंद नहीं है का साथ भी इनको मिलता हुआ दिखता है,जो कुछ खाश लोगों के जरिए पूरे साल केवल अपने नाम को ही प्रदर्शित करता हुआ दिखता हैं।
खिलाड़ी का अनुभव टीम को मदद कर सकता हैं लेकिन वह अच्छा कोच हो यह बात सही नहीं दिखती है।
राकेश मिश्रा और इस खिलाड़ी की जोड़ी नए गुल खिला सकती हैं। एजीएम में इस और भी यूपीसीए को देखना होगा।
राकेश मिश्रा यूपीसीए की कमान अपने हाथ में और पूर्व खिलाड़ी कोचिंग की कमान अपने हाथ मे लेने को किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं।

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