
संवाददाता
कानपुर। खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने और उन्हें बेहतर मंच उपलब्ध कराने के दावे करने वाले खेल विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। मुक्केबाजी में जिम्मेदारों की कथित लापरवाही का खामियाजा उन खिलाड़ियों को भुगतना पड़ा, जो प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की उम्मीद लेकर झांसी पहुंचे थे। कानपुर मंडल की मुक्केबाजी टीम झांसी पहुंचने के बाद आवश्यक दस्तावेज पूरे नहीं होने के कारण बिना मुकाबला खेले ही वापस लौट आई। इस घटना से खिलाड़ियों का मनोबल टूटने के साथ उनके अभिभावकों में भी नाराजगी बताई जा रही है।
बताया जाता है कि ग्रीनपार्क में तैनात मुक्केबाजी कोच से जिला और मंडल स्तर के ट्रायल से संबंधित जिम्मेदारियों को लेकर चूक हुई। आरोप है कि समय रहते ट्रायल और टीम से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी नहीं की गईं। जिला मुक्केबाजी संघ के सचिव की ओर से मामला याद दिलाए जाने के बाद कोच ने अपनी गलती स्वीकार की। इसके बावजूद खिलाड़ियों को झांसी भेजते समय जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए, जिसका परिणाम यह हुआ कि खिलाड़ी प्रतियोगिता में उतरने के बजाय वापस लौटने को मजबूर हो गए।
दस्तावेजों के बिना खिलाड़ियों को भेजने का आरोप, जिला संघ की आपत्ति के बाद कोच ने क्लर्क पर डाली जिम्मेदारी।
मामला सामने आने के बाद जिला मुक्केबाजी संघ की ओर से आपत्ति दर्ज कराई गई। सूत्रों के मुताबिक इसके बाद कोच की ओर से जिम्मेदारी से बचने के लिए यह दलील दी गई कि क्लर्क ने कागजात उपलब्ध नहीं कराए थे। सवाल यह है कि यदि दस्तावेज जरूरी थे तो खिलाड़ियों को रवाना करने से पहले उनकी जांच किसकी जिम्मेदारी थी? खिलाड़ियों को अधूरी तैयारी के साथ प्रतियोगिता स्थल तक भेजने की जवाबदेही आखिर किसकी तय होगी?
खेल विभाग की कार्यशैली पर इससे भी बड़ा सवाल यह है कि ग्रीनपार्क में तैनात कुछ कोचों की गतिविधियों को लेकर लगातार चर्चाएं होती रहती हैं। आरोप है कि खिलाड़ी और खेल प्रशिक्षण प्राथमिकता में होने के बजाय क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी (आरएसओ) के आसपास नजर आना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यदि यह स्थिति सही है तो विभागीय अधिकारियों को इसकी निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। प्रतियोगिता से पहले दस्तावेजों की जांच जैसी बुनियादी जिम्मेदारी में चूक ने खिलाड़ियों की मेहनत पर पानी फेर दिया। अब देखना यह है कि खेल विभाग इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करता है या फिर कागजों की जिम्मेदारी क्लर्क पर डालकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।




