June 30, 2026

सीएसजेएमयू ने तैयार किया अनूठा ‘जागरूकता पैमाना’।

संवाददाता

कानपुर।  हमारे देश के छात्र शोध तो कर लेते हैं, लेकिन क्या वे अपने काम को दुनिया के सामने सही तरीके से रख पाते हैं? क्या उन्हें रिसर्चगेट, गूगल स्कॉलर और स्कोपस जैसे वैश्विक ऑनलाइन मंचों की सही जानकारी है? इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के शिक्षा विभाग ने एक अनोखा और मानकीकृत पैमाना तैयार किया है।

इसे ‘ग्लोबल रिसर्च-ओरिएंटेड यूटिलिटी प्लेटफॉर्म्स अवेयरनेस स्केल’ यानी ग्रुप  स्केल नाम दिया गया है। कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक के नेतृत्व में सहायक प्रोफेसर डॉ. विमल सिंह ने इसे विकसित किया है, जिसका ट्रायल उत्तर प्रदेश के 800 पोस्ट ग्रेजुएट और पीएचडी छात्रों पर किया जा चुका है।

प्रो. विमल सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि,यह नया पैमाना ओयूआर दृष्टिकोण पर आधारित है, जो शोधार्थियों को तीन स्तरों पर परखेगा। इसमें सबसे पहले ‘ओरिएंटेशन’ यानी जानकारी को देखा जाएगा कि छात्र को इन वैश्विक ऑनलाइन मंचों के बारे में कितनी बुनियादी समझ है। इसके बाद ‘यूटिलिटी’ यानी उपयोगिता के स्तर पर यह परखा जाएगा कि छात्र इन मंचों का कितना व्यावहारिक इस्तेमाल करता है, जैसे पेपर ढूंढना या अपने शोध को अपलोड करना। आखिर में ‘रिलेवेंस’ यानी प्रासंगिकता के जरिए यह जाना जाएगा कि छात्र इन मंचों को अपने करियर और काम के लिए कितना जरूरी समझता है।

इस पैमाने को बेहद वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया गया है। शुरुआत में विशेषज्ञों की टीम ने 56 प्रश्नों का एक सेट बनाया था। बारीकी से जांच और भाषाई सुधार के बाद इनमें से 25 गैर-जरूरी सवालों को हटा दिया गया और सिर्फ 31 सटीक प्रश्नों को ही शामिल किया गया। नई दिल्ली के ‘मानस साइन होम’ द्वारा प्रकाशित यह पैमाना जांच में पूरी तरह विश्वसनीय और मान्य पाया गया है। इसके सभी आयामों का विश्वसनीयता स्कोर $0.70$ से ऊपर रहा है, जो विज्ञान की भाषा में बेहतरीन माना जाता है।

इस टेस्ट में कुल 31 प्रश्न होंगे, जिसमें अधिकतम 155 और न्यूनतम 31 अंक मिलेंगे। अंकों के आधार पर छात्रों को पांच अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाएगा। जो छात्र 76 अंक से कम लाएंगे, उन्हें बहुत निम्न स्तर पर रखा जाएगा यानी उन्हें इन मंचों की जानकारी न के बराबर है।

77 से 92 अंक वाले छात्रों को निम्न स्तर पर रखा जाएगा, जिन्हें सिर्फ बुनियादी समझ है। 93 से 104 अंक वाले मध्यम स्तर में आएंगे, जिन्हें और सुधार की जरूरत होगी। वहीं, 105 से 122 अंक वाले छात्र उच्च स्तर पर और 122 अंक से अधिक लाने वाले छात्र बहुत उच्च स्तर की श्रेणी में गिने जाएंगे, जो वैश्विक मंचों का बेहतरीन उपयोग कर रहे हैं।

आज के डिजिटल दौर में रिसर्च को दुनिया के साथ साझा करना बेहद जरूरी है। डॉ. विमल सिंह के मुताबिक, इंसानी जरूरतों को समझना ही उन्हें पूरा करने का आधा काम है। यह पैमाना विश्वविद्यालयों को यह जानने में मदद करेगा कि उनके शोधार्थी वैश्विक स्तर पर कहां खड़े हैं। इससे कमजोर छात्रों की पहचान कर उन्हें विशेष ट्रेनिंग दी जा सकेगी, जिससे भारतीय शोध की गुणवत्ता बढ़ेगी और उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी।