• सियासत के रंग में रंगा शैक्षणिक सत्र
• आठ बूथ, एक चिंता: ‘संवेदनशील’ का ठप्पा क्यों?

आज़ाद समाचार ब्यूरो
शिवराजपुर (कानपुर नगर)। कानपुर के जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने शनिवार दोपहर शिवराजपुर स्थित पीएम श्री विद्यालय शिवराजपुर प्रथम का औचक निरीक्षण तो किया, लेकिन असल मकसद शैक्षणिक सत्र से कहीं ज्यादा आगामी विधानसभा चुनाव 2027 के मतदान केंद्रों को ‘चाक-चौबंद’ करना निकला। स्कूल के बहाने चुनावी बूथों की जांच करते हुए डीएम ने अधिकारियों को खुली चुनौती दे डाली कि पुरानी और भ्रामक बूथों के नामों में विसंगति को जल्द दूर किया जाए, वर्ना चुनाव के दौरान अफरा-तफरी मच सकती है।
जिलाधिकारी ने जब विद्यालय परिसर में बने कुल आठ मतदान बूथों का निरीक्षण किया, तो उनकी नज़र सबसे पहले बूथों के नामकरण पर पड़ी। ‘प्राथमिक विद्यालय प्रथम’ और ‘प्राथमिक विद्यालय द्वितीय’ जैसे दशकों पुराने नामों पर उन्होंने तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि ऐसे नाम मतदाताओं से लेकर पोलिंग पार्टियों और प्रत्याशियों तक सबको भ्रमित कर सकते हैं।
उन्होंने सख्त लहजे में कहा— “यह विसंगति समय की बर्बादी और भ्रम का कारण बन सकती है। इसे तत्काल अद्यतन किया जाए, ताकि चुनाव के दिन कोई यह न सोचे कि उसका बूथ किसी दूसरी दुनिया में है।”
उप जिलाधिकारी मनीष कुमार को निर्देश दिए गए कि इस विसंगति को तय समयसीमा में जड़ से खत्म किया जाए।
डीएम ने साफ कहा कि इन दो स्कूलों में संचालित आठों बूथ संवेदनशील श्रेणी में आते हैं। यानी जहां हर छोटी-बड़ी व्यवस्था पर पैनी नज़र रखनी होगी। उन्होंने बूथों पर रोशनी, रैंप, शौचालय, पेयजल और वाहन पहुंच जैसी बुनियादी सुविधाओं की जांच तो की, लेकिन इसे सिर्फ औपचारिकता कहना गलत होगा।
असली टेस्ट तो चुनाव के दिन होगा, जब पता चलेगा कि ये इंतजाम कागजों में कितने और हकीकत में कितने हैं। डीएम ने यह भी रेखांकित किया कि अगर किसी मतदाता या दल को बूथ बदलने की जरूरत महसूस हो, तो वह बीएलओ या उप जिलाधिकारी के माध्यम से समय रहते आवेदन करे — ताकि बाद में किसी को ‘यह तो ठीक नहीं था’ कहने का मौका न मिले।
जिलाधिकारी के आने की भनक लगते ही प्रशासनिक तंत्र सक्रिय हो गया। स्कूल के सामने शिवराजपुर से शिवली तक फुटपाथ पर चल रहे अवैध ई-रिक्शा स्टैंड को धड़ाधड़ हटाया गया। मानो डीएम के कदमों से ही सड़कें साफ हो गईं।
स्थानीय नायब तहसीलदार रंजीत यादव, लेखपाल प्रदीप श्रीवास्तव और थाना अध्यक्ष अमित कुमार सिंह अपने पुलिस बल के साथ पूरे मूड में नज़र आए—मानो स्कूल निरीक्षण से ज्यादा बूथों की ‘सुरक्षा’ उनकी प्राथमिकता थी।

डीएम ने 25 जून से शुरू हुए नए सत्र में बच्चों और शिक्षकों की उपस्थिति तो जाँची, बच्चों से बातचीत भी की—लेकिन यह सब फोकस से उतना नहीं जुड़ा, जितना चुनावी कैलेंडर से।
सवाल उठता है—क्या यह निरीक्षण सच में शिक्षा के लिए था, या 2027 की चुनावी रणनीति का एक दांव? जब डीएम खुद चुनावी बूथों को ‘संवेदनशील’ करार दे रहे हैं, नाम सुधारने पर जोर दे रहे हैं और अवैध रिक्शा स्टैंड तक हटवा रहे हैं, तो साफ है—स्कूल तो बहाना है, असली खेल तो वोटिंग केंद्रों का है।
शिक्षा विभाग के लिए एक सामान्य निरीक्षण बनकर आया डीएम, चुनावी तैयारियों का ‘कमांडर’ बनकर लौटा। प्रशासन भले ही ‘सत्यापन’ और ‘व्यवस्था’ के शब्दों में लपेटता रहे, लेकिन हकीकत यह है कि 2027 की चुनावी घड़ी की टिक-टिक आज से ही सुनी जाने लगी है।
बूथों के पुराने नाम बदलने का आदेश देकर डीएम ने न सिर्फ प्रशासनिक खामियों को उजागर किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि समय रहते हर विसंगति को दुरुस्त कर लिया जाए—क्योंकि चुनाव में गलती सिर्फ प्रत्याशी को ही नहीं, बल्कि प्रशासन को भी भारी पड़ सकती है।
जब डीएम को स्कूल के बूथों के नाम ‘प्रथम-द्वितीय’ से भ्रम हो रहा है, तो आम मतदाता जो कभी स्कूल नहीं गया, उसके लिए यह प्रशासनिक ‘सत्यापन’ कितना मायने रखेगा—यह तो 2027 का ही बताएगा। फिलहाल, शिवराजपुर में शनिवार का दिन ‘स्कूल डायरी’ से ज्यादा ‘चुनावी बूथ डायरी’ के तौर पर दर्ज हो गया।






