
संवाददाता
कानपुर। उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (यूपीसीए) में एक बार फिर से एक निजी सहायक (पीए) के असाधारण प्रभाव को लेकर विवाद गहरा गया है। आरोप है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले इस ‘सुपर पावर’ पीए ने संगठन के भीतर अपनी ऐसी पकड़ बना ली है कि चयन समिति, टीम प्रबंधन और प्रशासनिक नियुक्तियों तक में उसका ही इशारा चलता है। क्रिकेट गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि इसी के कहने पर पिछले कुछ समय में कई चयनकर्ताओं, कोचों और मैनेजरों को हटाया जा चुका है, जबकि नए पदों पर उसके करीबी लोगों को ही वरीयता दी जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, आरोपी पीए न केवल राज्य के भीतर, बल्कि हरियाणा, दिल्ली और पंजाब जैसे बाहरी राज्यों के अपने एजेंटों के नेटवर्क के माध्यम से खिलाड़ियों, कोचों और स्टाफ की तलाश कर उन्हें यूपीसीए की विभिन्न टीमों में शामिल कराने का काम कर रहा है। ताजा मामला यह भी सामने आया है कि उसने अपने गृह जनपद की पुरानी क्रिकेट एसोसिएशन को भंग करके एक नई एसोसिएशन बनवाई, जिसके सभी पदों पर उसके करीबियों को बिठाया गया। इससे प्रदेश के स्थानीय और वरिष्ठ खिलाड़ियों, कोचों और प्रबंधकीय प्रतिभाओं में गहरा आक्रोश है, जिन्हें वर्षों की मेहनत के बावजूद अपेक्षित अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।
यूपीसीए के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि इस पीए के खिलाफ खुलकर बोलने से लोग इसलिए बचते हैं, क्योंकि उसकी पहुंच इतनी मजबूत मानी जाती है कि पिछले कई वर्षों में उसके खिलाफ लगे आरोपों का कोई असर नहीं हुआ। हालांकि, अब क्रिकेट प्रेमियों और हितधारकों में यह मांग तेज हो गई है कि चयन, नियुक्तियों और टीम प्रबंधन से जुड़ी सभी प्रक्रियाओं को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए, ताकि संस्थागत व्यवस्था कमजोर न पड़े और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की प्रतिभाओं को उचित मंच मिल सके।
इस मामले में आरोपी ‘सुपर पावर’ पीए से संपर्क करने का प्रयास सफल नहीं हो सका। वहीं, यूपीसीए के एक पूर्व सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर पुष्टि की कि वर्तमान में संघ का कामकाज इसी पीए के इशारों पर चल रहा है और वही तय करता है कि टीमों में किसे खिलाना है और किसे खेलना है। अब देखना यह होगा कि इस बढ़ते विवाद पर यूपीसीए प्रशासन क्या रुख अपनाता है और पारदर्शिता को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब कैसे देता है।





