
संवाददाता
कानपुर। धर्मात्मा और वीरांगना अहिल्याबाई होल्कर की जयंती पर आज उत्सव वाटिका में आयोजित एक विशेष शिविर में साधकों ने न सिर्फ अहिल्याबाई होल्कर को याद किया, बल्कि उनके विचारों को जीवन में उतारने का संकल्प भी लिया।
इस मौके पर चर्चा करते हुए ललित अग्रवाल ने कहा कि आज के दौर में अहिल्याबाई होल्कर के प्रति केवल कृतज्ञता जताना या उन्हें याद कर लेना ही काफी नहीं है, बल्कि देश और समाज के सामने खड़ी चुनौतियों का निवारण करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
सुबह 6 बजे शुरू हुए इस शिविर का आगाज जगत पिता सूर्यदेव के अंश के रूप में ज्योति प्रज्वलित करके पूरे श्रद्धाभाव के साथ किया गया। इसके बाद शिविर में मौजूद सभी लोगों ने शरीर, मन और चेतना को जाग्रत करने वाले कई प्रयोग किए।
शिविर में अहिल्याबाई होल्कर के ऐतिहासिक कार्यों को याद करते हुए उनके साहस की सराहना की गई। वक्ताओं ने कहा कि यह उस दौर की बात है जब विदेशी आक्रांता काशी और सोमनाथ जैसे हमारे देश के प्रसिद्ध और पवित्र तीर्थ स्थलों को तोड़ रहे थे, उन्हें तहस-नहस किया जा रहा था। उस कठिन समय में वीरांगना अहिल्याबाई होल्कर ने आगे आकर अपना तन, मन और धन सब कुछ दांव पर लगा दिया और इन तीर्थ स्थलों की पुनर्स्थापना कराई। अगर उन्होंने उस वक्त यह कदम नहीं उठाया होता, तो आज हमारे देश का धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास कुछ और ही होता।
अहिल्याबाई होल्कर को याद करने के साथ-साथ शिविर में भारतीय काल गणना पर भी गंभीर चर्चा हुई। ललित अग्रवाल ने वैज्ञानिक कारणों और तथ्यों के साथ समझाया कि आखिर हर तीन साल बाद पुरुषोत्तम मास क्यों आता है। उन्होंने युगाब्द 5128 और अधिक ज्येष्ठ पूर्णिमा के महत्व को वैज्ञानिक नजरिए से साधकों के सामने रखा, जिसे लोगों ने काफी दिलचस्पी के साथ समझा।






