
संवाददाता
कानपुर। उत्तर प्रदेश क्रिकेट में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं, लेकिन यूपीसीए की टीमों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो सवाल अब सिर्फ खिलाड़ियों पर नहीं, सपोर्टिंग स्टाफ की नियुक्तियों पर भी खड़े होने लगे हैं। जूनियर से लेकर सीनियर रणजी ट्रॉफी तक टीमों को चैंपियन बनाने का सपना तो हर साल दिखाया जाता है, लेकिन मैदान पर उसका असर नजर नहीं आता। दूसरी ओर बाहरी प्रदेशों से जुड़े कोच वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं और लाखों रुपये की फीस हासिल कर रहे हैं।
यही वजह है कि अब यूपी क्रिकेट के गलियारों में एक सीधा सवाल गूंज रहा है—जब कोच बदलते नहीं, फीस घटती नहीं और साल-दर-साल सेवाएं जारी रहती हैं तो फिर प्रदर्शन में चैंपियन वाला बदलाव आखिर आता क्यों नहीं?
सपोर्टिंग स्टाफ में कोच के रूप में सौरभ दुबे, मुमताज कादिर और ध्रुव सिंह जैसे नामों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इनमें कई का क्रिकेटिंग जुड़ाव उत्तर प्रदेश से बाहर की टीमों से रहा है। ऐसे में सवाल यह नहीं कि बाहरी व्यक्ति को मौका क्यों दिया गया, बल्कि सवाल यह है कि क्या उसके चयन का आधार उसका ठोस कोचिंग रिकॉर्ड और परिणाम भी है?
अगर किसी कोच की सेवाएं वर्षों तक ली जा रही हैं तो उसका मूल्यांकन भी होना चाहिए। कितने खिलाड़ियों को तैयार किया? कितने खिलाड़ियों ने उच्च स्तर पर जगह बनाई? टीम ने कितने खिताब जीते? प्रदर्शन का ग्राफ ऊपर गया या नीचे? इन सवालों के जवाब आंकड़ों से मिलने चाहिए, सिफारिशों से नहीं।
सबसे ज्यादा चर्चा उस कथित प्रभावशाली ‘अघोषित सुपर सेलेक्टर’ की है, जिसके फैसलों को लेकर संघ के भीतर भी समय-समय पर सवाल उठने की बातें सामने आती हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। दिलचस्प यह है कि अंदरखाने चर्चा होने के बावजूद खुलकर बोलने वाले कम हैं। वजह भी साफ है—जिस व्यवस्था में रहना हो, उसके फैसलों को चुनौती देना आसान नहीं होता।
यूपी के पास प्रतिभाशाली पूर्व खिलाड़ी, अनुभवी कोच और क्रिकेट की लंबी परंपरा है। इसके बावजूद यदि महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के लिए बार-बार बाहर के चेहरों पर भरोसा करना पड़ रहा है और नतीजे अपेक्षा के मुताबिक नहीं आ रहे, तो यूपीसीए को अपनी चयन और नियुक्ति व्यवस्था का आईना खुद देखना होगा।
आखिर सवाल एकदम सीधा है—जब फीस लाखों में हो, कार्यकाल वर्षों का हो और अधिकार बड़े हों, तो फिर जवाबदेही सिर्फ खिलाड़ियों की ही क्यों?





