May 13, 2026

• 500 दुकानदारों पर छाया रोजी-रोटी पर संकट।




संवाददाता
कानपुर।  परेड मैदान में लगने वाली दुकानों को नगर निगम ने अतिक्रमण घोषित कर दिया है।
शुक्रवार को मार्केट हटाने का ऐलान किए जाने के बाद से यहां के दुकानदारों में डर का माहौल है। उनका कहना है- अब हम कहां जाएंगे?
यहां तिरपाल, टट्टर और पन्नियों से बनी करीब 500 से ज्यादा छोटी-बड़ी दुकानें हैं। इनमें महिलाओं के कपड़े, कटपीस, पैंट, शर्ट और घर के जरूरी सामान बिकते हैं। यहां पर रोजाना बड़ी संख्या में लोग खरीदारी करने के लिए आते हैं।
परेड ग्राउंड का इतिहास अंग्रेजों के समय से जुड़ा बताया जाता है। समय के साथ यहां यह बाजार बस गया और धीरे-धीरे सैकड़ों परिवारों की आजीविका का साधन बन गया। अब इस बाजार को हटाने की बात सामने आने के बाद सालों से यहां काम कर रहे दुकानदारों के सामने भविष्य को लेकर अनिश्चितता खड़ी हो गई है।
शुक्रवार को अचानक नगर निगम की एक जीप परेड ग्राउंड बाजार में पहुंची। टीम ने कुछ दुकानदारों से कहा कि यह सब अतिक्रमण की श्रेणी में आता है। कर्मचारियों ने कहा कि नगर निगम से आए हैं और दो दिन का समय दिया जा रहा है। दुकानदारों से कहा गया कि खुद ही अपना सामान हटा लें, वरना अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाएगी।
इस चेतावनी के बाद दुकानदारों में अफरा-तफरी मच गई और वे काफी परेशान हो गए। घबराए हुए दुकानदारों ने उसी दिन जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर पूरे मामले की जानकारी दी।
शनिवार को इस मुद्दे को लेकर सपा और कांग्रेस के नेताओं ने परेड ग्राउंड में 500 से अधिक दुकानदारों के साथ बैठक की। बैठक में सपा के तीन विधायक और कांग्रेस के कई पदाधिकारी मौजूद रहे। दोनों ही दलों ने दुकानदारों को भरोसा दिया कि वे इस लड़ाई में कानूनी और वैधानिक रूप से उनका पूरा साथ देंगे। साथ ही यह भी कहा गया कि दुकानों को हटाने के फैसले पर अधिकारियों से मुलाकात कर दुकानदारों का पक्ष मजबूती से रखा जाएगा।
78 वर्षीय दुकानदार मोहम्मद कासिम ने बताया- यह दुकान हमारे बाप-दादाओं के जमाने से है। जब मैं 12 साल का था, तभी से यहां आना-जाना शुरू हो गया था। मेरी पूरी जिंदगी यहीं गुजर गई और अब मेरे बच्चे भी यहीं दुकान चला रहे हैं। इस उम्र में मुझे कोई नौकरी भी नहीं देगा।
नफीस नूरी ने बताया- मेरे दादा ने यहां दुकान लगानी शुरू की थी। 1980 से मैं खुद यहां दुकान पर आने लगा। मैं तीसरी पीढ़ी का दुकानदार हूं। पहले यहां नगर निगम तहबाजारी वसूलता था, उस समय 50 पैसे की पर्ची कटती थी। बाद में इसे खत्म कर ठेका सिस्टम शुरू किया गया, लेकिन कभी अचानक दुकान हटाने की बात नहीं कही गई। हम छोटे दुकानदार हैं, जैसे-तैसे मेहनत करके परिवार चलाते हैं, लेकिन अगर दुकानें हट जाएंगी तो हम लोग क्या करेंगे।
कन्हैया लाल ने कहा- हमारी करीब 40 साल पुरानी दुकान है। मेरे बेटे भी यहीं काम करते हैं। आज तक कभी कोई नोटिस नहीं आया। पिछले कुछ दिनों से काफी दिक्कत बढ़ गई है। अगर दुकानें हटा दी गईं तो हम पूरी तरह बेरोजगार हो जाएंगे। इस उम्र में नौकरी मिलना भी संभव नहीं है।
नूर हसन अंसारी ने कहा- जब भी मैदान में कोई बड़ा कार्यक्रम होता था, तो पहले से सूचना मिल जाती थी कि दुकानें हटा ली जाएं। लेकिन इस बार बिना नोटिस के ही कार्रवाई की बात कही जा रही है। यहां सिर्फ दुकानदार ही नहीं, बल्कि आसपास के गरीब और निम्न वर्ग के लोग भी आते हैं, जो सस्ते कपड़े और जरूरी सामान खरीदते हैं। यह बाजार सिर्फ रोजगार का नहीं, बल्कि हजारों लोगों की जरूरतों से भी जुड़ा हुआ है।
मोहम्मद सिराज ने बताया-हम जैसे गरीब लोगों की रोजी-रोटी इसी बाजार से चलती है। नगर निगम की टीम आई थी और दो दिन में दुकान हटाने को कहा गया, लेकिन अभी तक कोई लिखित नोटिस नहीं मिला है।
1857 की क्रांति के समय अंग्रेजों ने शेख सलार बख्श को कानपुर का कोतवाल नियुक्त किया था। वह दौर स्वतंत्रता संग्राम का था, लेकिन सलार बख्श ने कोतवाल रहते हुए अपने कामकाज से अंग्रेज अधिकारियों का विश्वास जीता। उस समय अंग्रेजी सेना इसी परेड ग्राउंड में परेड किया करती थी। माना जाता है कि उनके कार्य से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने यह परेड ग्राउंड सलार बख्श को उपहार स्वरूप दे दिया था।
आजादी के बाद 1947 के बाद इसी मैदान में धीरे-धीरे बाजार लगने लगी। शुरुआत में यह बाजार दिन के हिसाब से लगती थी, जहां लोग अपनी जरूरत का सामान खरीदने आते थे और यह स्थान स्थानीय व्यापार का अहम केंद्र बन गया।
यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की सब-कमेटी के पूर्व सदस्य गुरफान अहमद चांद के अनुसार, शेख सलार बख्श ने इस ग्राउंड को जनहित में वक्फ कर दिया था। इसके बाद यहां बाजार का स्वरूप और स्थायी होता गया और इसका नाम रजबी ग्राउंड भी कहा जाने लगा। समय के साथ यहां न सिर्फ व्यापार, बल्कि बड़े धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम भी आयोजित होने लगे।
इसके बाद हिंदू-मुस्लिम एकता तहफ्फुज कमेटी का गठन हुआ, जिसके पास वक्फ से जुड़े दस्तावेज भी मौजूद रहे। कुछ समय तक यहां दुकान लगाने वालों से शुल्क भी वसूला जाता था। हालांकि करीब 12 साल पहले परेड ग्राउंड में आग लगने की घटना हुई, जिसमें कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जलकर नष्ट हो गए। इसके बाद कई बार रिकॉर्ड तलाशने की कोशिश की गई, लेकिन कोई ठोस दस्तावेज उपलब्ध नहीं हो सका।

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