
संवाददाता
कानपुर। गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे बच्चों को गंभीर खतरे से बचाने के लिए जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने एक सस्ती और उपयोगी स्क्रीनिंग तकनीक विकसित की है।
अस्पताल के ऑब्स एंड गायनी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रश्मि यादव ने ‘जेस्टोसिस स्कोर’ पर रिसर्च की है। इसके जरिए गर्भावस्था के शुरुआती तीन महीनों में ही यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि महिला को आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर और प्री-एक्लेम्पसिया का खतरा है या नहीं।
डॉ. रश्मि के मुताबिक गर्भावस्था के अंतिम महीनों में अचानक बढ़ा ब्लड प्रेशर मां और बच्चे दोनों के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। जेस्टोसिस स्कोर में यदि स्कोर 3 या उससे अधिक आता है तो महिला को हाई रिस्क श्रेणी में रखकर उसकी विशेष निगरानी की जाती है।
एक मामले में गर्भावस्था के शुरुआती तीन महीनों में महिला का जेस्टोसिस स्कोर 3 आया। डॉक्टरों ने उसे हाई रिस्क मानते हुए सामान्य अंतराल के बजाय हर 15 दिन में फॉलोअप किया। पांचवें महीने में उसका ब्लड प्रेशर बढ़ने लगा, जिसे समय रहते दवाओं से नियंत्रित कर लिया गया। महिला को न दौरे आए और न ही किसी अंग को नुकसान पहुंचा। बाद में उसने स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।
एक अन्य महिला पहले गंभीर प्री-एक्लेम्पसिया का सामना कर चुकी थी। दूसरी गर्भावस्था में शुरुआती जांच में उसका जेस्टोसिस स्कोर 3 से अधिक आया। इसके बाद डॉक्टरों ने इलाज और निगरानी का प्रोटोकॉल बदल दिया। समय पर उपचार मिलने से इस बार मां और बच्चा दोनों सुरक्षित रहे।
इस रिसर्च के तहत जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में अब तक 1000 से अधिक गर्भवती महिलाओं की स्क्रीनिंग की जा चुकी है। इनमें जेस्टोसिस स्कोर 3 से अधिक वाली करीब 50 महिलाओं में गर्भावस्था के अंतिम महीनों में बीपी बढ़ने और उससे जुड़ी गंभीर समस्याएं देखने को मिलीं।
इस तकनीक की खासियत यह है कि इसके लिए महंगी मशीन या बड़े खर्च की जरूरत नहीं होती। डॉक्टरों का कहना है कि शुरुआती स्तर पर हाई रिस्क गर्भावस्था की पहचान और नियमित निगरानी से मां और बच्चे को गंभीर जटिलताओं से बचाने में मदद मिल सकती है।
डा. रश्मि यादव






