March 10, 2026

संवाददाता
कानपुर।
नरवल तहसील क्षेत्र में स्थित ड्योढ़ी और नजफगढ़ गंगा घाट पर रविवार को पितृ पक्ष की अमावस्या का विशेष आयोजन हुआ। हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान कर अपने पूर्वजों को जल और पुष्प अर्पित किए।

बिल्हौर के गंगा किनारे स्थित सेंग घाट पर पितृ अमावस्या के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी गई। सुबह से ही दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं ने हर-हर गंगे के जयकारों के साथ पवित्र गंगा में स्नान किया।

चौबेपुर स्थित बंदी माता गंगा घाट पर पितृ अमावस्या के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान के साथ अपने पूर्वजों की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण किया।

सुबह से ही श्रद्धालु दूर-दूर से गंगा घाट पर पहुंचने लगे। हर हर गंगे के जयकारों के बीच लोगों ने पवित्र गंगा में स्नान किया। पितृ अमावस्या का विशेष महत्व पितरों के तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। सर्व पितृ अमावस्या पर स्नान करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। यह तिथि पितरों के तर्पण के लिए विशेष रूप से शुभ मानी जाती है।

दिन चढ़ने के साथ गंगा घाट पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई। भक्तिमय माहौल में लोगों ने विधि-विधान से श्राद्ध कर्म संपन्न किए। पितृ दोष से मुक्ति के लिए इस दिन का श्राद्ध विशेष महत्व रखता है।

पितृ विसर्जनी अमावस्या के पावन अवसर पर गंगा तटों पर श्रद्धालुओं का भारी जमावड़ा देखने को मिला। भोर से ही श्रद्धालु जन पवित्र गंगा में स्नान कर तर्पण और पिंडदान के माध्यम से अपने पितरों को विदा करने पहुंचे। गंगा घाटों पर श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम दिखाई दिया।

खेरेश्वर सरैया, नानामऊ, आंकिन और बंदीमाता सहित क्षेत्र के प्रमुख घाटों पर सुबह से ही तर्पण व श्राद्धकर्म करने वालों की लंबी कतारें लगी रहीं। जिन पूर्वजों की तिथियाँ अज्ञात थीं, उनके लिए भी परिजनों ने पूरे विधि-विधान से तर्पण और श्राद्ध कर्म किया। इसी के साथ 15 दिनों तक चलने वाले पितृ पक्ष का विधिवत समापन हो गया।

आचार्य विजय जी ने बताया कि पितृ विसर्जनी अमावस्या सनातन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-दक्षिणा से न केवल पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि करने वालों को पितृ ऋण से मुक्ति का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।

गंगा घाटों पर सुबह से ही मंत्रोच्चार, घंटी ध्वनि और आरती की गूंज वातावरण को पावन बना रही थी। श्रद्धालुओं ने ॐ पितृभ्यः स्वाहा उच्चारण के साथ जल अर्पित किया। महिलाएँ और पुरुष पारंपरिक परिधान में आस्था भाव से पितरों की स्मृति में दीपदान और अन्नदान कर रही थीं।

हर ओर धूप-अगरबत्ती की सुगंध, वेद मंत्रों की ध्वनि और गंगा की लहरों पर बहते पिंडदान के दृश्य गहन आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव करा रहे थे। श्रद्धालुओं का मानना है कि पितृ विसर्जनी अमावस्या कृतज्ञता और संस्कार का पर्व है, जो हमें पूर्वजों के प्रति कर्तव्य और आस्था की गहरी अनुभूति कराता है।

श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से अपने पूर्वजों की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण किया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ अमावस्या का दिन पितरों के श्राद्ध कर्म के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन किए गए दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है।

गंगा में स्नान करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है। यह दिन पितृ दोष से मुक्ति के लिए भी विशेष माना जाता है। 

धार्मिक विशेषज्ञ अंकित तिवारी के अनुसार, पितृ अमावस्या पर विशेष रूप से उन मृतकों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु अमावस्या तिथि पर हुई हो। यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश श्राद्ध नहीं कर पाया हो, तो वह अमावस्या पर श्राद्ध कर सकता है।
इस दिन किए गए श्राद्ध से सभी पितरों की आत्माएं तृप्त होती हैं। इसी कारण इसे सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या भी कहा जाता है।
श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए गंगा घाटों पर पुलिस बल तैनात रहा।