March 7, 2026

संवाददाता
कानपुर। 
आईआईटी कानपुर ने चिकित्सा विज्ञान और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने एंटीबॉडी आधारित एक विशेष बायोसेंसर विकसित किया है, जो जीवित कोशिकाओं में जी प्रोटीन-कपल्ड रिसेप्टर्स की सक्रियता को वास्तविक समय में मॉनिटर कर सकता है।
यह तकनीक दवाओं के असर को बेहतर तरीके से समझने और नई दवाओं के विकास की दिशा में अहम भूमिका निभाएगी।
जी प्रोटीन-कपल्ड रिसेप्टर्स मानव कोशिकाओं में सबसे बड़ी रिसेप्टर प्रोटीन फैमिली है और एक-तिहाई से अधिक क्लिनिकल दवाएं इन्हीं को टारगेट करती हैं। अब तक इन्हें जीवित कोशिकाओं में सक्रिय अवस्था में देखना और अध्ययन करना वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती था।
यह शोध प्रो. अरुण के. शुक्ला के नेतृत्व में किया गया, जो पिछले एक दशक से इस पर काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस बायोसेंसर की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें जी प्रोटीन-कपल्ड रिसेप्टर्स को किसी भी तरह से संशोधित करने की जरूरत नहीं होती।
इसके बावजूद यह रिसेप्टर्स की सक्रियता को ट्रैक कर सकता है। यह रोगों की स्थिति में उनकी इमेजिंग की नई संभावनाएं खोलता है।
इस सेंसर की तकनीक खास है क्योंकि यह इंजीनियर किए गए नैनोबॉडी के जरिए केवल उन्हीं रिसेप्टर्स से जुड़ता है जो सक्रिय अवस्था में होते हैं। सक्रिय होते ही यह एंजाइम की प्रतिक्रिया को ट्रिगर करता है, जिससे प्रकाशीय संकेत पैदा होता है और वैज्ञानिक आसानी से उसे माप सकते हैं।
आईआईटी कानपुर की पीएचडी स्कॉलर अनु दलाल ने कहा कि यह सेंसर हमें कोशिकाओं के अलग-अलग हिस्सों में जी प्रोटीन-कपल्ड रिसेप्टर्स की स्थिति की निगरानी करने की सुविधा देता है। इसके जरिए हम उनके सिग्नलिंग तंत्र को गहराई से समझ पाएंगे और यह नई दवाओं की खोज में बेहद सहायक होगा।
यह प्रोजेक्ट चेक गणराज्य के प्राग स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ ऑर्गेनिक केमिस्ट्री एंड बायोकैमिस्ट्री के प्रो. जोसेफ लाजर की टीम के सहयोग से पूरा हुआ। इसे भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा भारत-चेक संयुक्त अनुसंधान पहल के तहत फंडिंग मिली।
इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, यूएसए में प्रकाशित हुए हैं, जिसे वैज्ञानिक समुदाय में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।