April 30, 2026

संवाददाता
कानपुर। 
जिस तरह से गर्मियों में तापमान बढ़ता जा रहा है इसका खेती और मानव स्वास्थ्य दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। लगातार गर्मी बने रहने के कारण अनेकों समस्याओ का सामना करना पड़ेगा।
मौसम विशेषज्ञ के मुताबिक 40 प्रतिशत ग्लेशियर पिघल चुके है। इस कारण जीवन दायिनी गंगा, यमुना व अन्य नदियों का पानी सूखेगा और जब ऐसी स्थिति आएगी तो  सबसे ज्यादा कृषि क्षेत्र प्रभावित होगा।
मौसम वैज्ञानिक प्रो. एसएन सुनील पांडेय ने बताया कि अब गर्मियों के दिन बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में यदि गर्म दिन अधिक होंगे तो यह फसल की पैदावार में कमी, कीटों और बीमारियों के प्रकोप में वृद्धि और पानी की कमी का कारण बनेगा।

उन्होंने बताया कि मानव स्वास्थ्य पर यह गर्मी से संबंधित बीमारियों जैसे लू लगना और निर्जलीकरण के जोखिम को बढ़ाता है। साथ ही संक्रामक रोगों के प्रसार का भी  कारण बनता है।
बढ़ती गर्मी फसल की वृद्धि और विकास को बाधित कर सकती है। इससे पैदावार में कमी आती है। गर्म तापमान कीटों और बीमारियों को बढ़ावा दे सकता है, जिससे फसलों को नुकसान होना तय है।
प्रो. पांडेय ने बताया कि उच्च तापमान वाष्पीकरण को बढ़ा सकता है, जिससे मिट्टी में नमी की कमी होती है और सिंचाई की आवश्यकता बढ़ती है।
बढ़ते तापमान से मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है और फसलों पर कीटों और बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
उच्च तापमान लू, गर्मी से होने वाली थकान और निर्जलीकरण जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है। गर्म तापमान संक्रामक रोगों के वाहकों, जैसे मच्छरों के जीवन चक्र को प्रभावित कर सकता है, जिससे इन रोगों के प्रसार की संभावना बढ़ जाती है।
उच्च तापमान हृदय गति को बढ़ा सकता है, जिससे हृदय संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।
इसके अलावा वायु गुणवत्ता में गिरावट हो सकती है, जिससे श्वसन संबंधी समस्याएं, जैसे अस्थमा बढ़ सकता है। अत्यधिक गर्मी मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगी, जिससे तनाव और चिंता बढ़ सकती है।
उच्च तापमान पोषण, अंकुर वृद्धि और पराग के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है जिसके परिणामस्वरूप कम उपज होती है । वह महत्वपूर्ण तापमान जिसपर पौधे मर जाते हैं उसे थर्मल मृत्यु बिंदु कहा जाता है। यह सीमा पौधों के साथ बदलती रहती है, छाया पसंद करने वाले पौधे कम तापमान पर मर जाते हैं। 

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