May 23, 2026

संवाददाता
कानपुर। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में शुक्रवार को “लर्निंग फॉर टुमारो: इंटीग्रेटिंग एनवायरमेंट, इक्विटी एंड सस्टेनेबिलिटी थ्रू एजुकेशन” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया।
इस सम्मेलन का आयोजन विश्वविद्यालय के सेनानायक तात्या टोपे सीनेट हॉल में हुआ । इस आयोजन में सतत विकास, समता, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा सुधार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, भारतीय ज्ञान परंपरा तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 जैसे समकालीन विषयों पर विशेषज्ञों ने विचार विमर्श किए ।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रो. अमिताभ मिश्रा, इंदिरा गांधी ओपेन यूनिवर्सिटी ने परिणाम आधारित शिक्षा, अधिगम योजना, शिक्षक की सुविधादाता के रूप में भूमिका, विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षण, अनुभवात्मक अधिगम, सामाजिक-भावनात्मक अधिगम तथा चिंतनपरक शिक्षण पर विस्तार से विचार रखे।
उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन विकसित करने के लिए शिक्षकों को ऐसी शिक्षण परिस्थितियाँ निर्मित करनी चाहिए जो उन्हें ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी हेतु प्रेरित करें। उन्होंने शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका तथा प्रभावी निर्देशन के महत्व को भी रेखांकित किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने अपने उद्बोधन में वैश्विक तापवृद्धि को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रति सजग रहने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने प्रौद्योगिकी और सामाजिक माध्यमों की बढ़ती भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था को तकनीकी परिवर्तनों के अनुरूप ढालना अत्यंत आवश्यक है।इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इस विषय पर शोधार्थी को शोध करनी चाहिए । 
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी ने संसाधनों की चुनौतियों के बीच आत्मनिर्भर राज्य विश्वविद्यालयों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए योग्य शिक्षकों की भूमिका, सामाजिक न्याय, भारतीय संस्कृति में निहित मानवीय मूल्यों तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 की रचनात्मक समीक्षा की आवश्यकता पर अपने विचार व्यक्त किए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि शिक्षकों को छात्रों के मन में आत्मविश्वास पैदा करना चाहिए । इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हमें खुद का आत्मावलोकन करना चाहिए।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि प्रो.प्रवीण तिवारी, दिल्ली विश्वविद्यालय ने कहा कि पश्चिमी देशों ने समता एवं सतत विकास के विमर्श पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने पर्यावरणीय संकट, नदियों की बिगड़ती स्थिति तथा सामूहिक जिम्मेदारी पर बल देते हुए जयशंकर प्रसाद के उपन्यास “तितली” का उल्लेख किया। उन्होंने भू-राजनीति में अमेरिका की भूमिका, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली, कार्बन उत्सर्जन के संदर्भ में प्रमुख देशों की जिम्मेदारी तथा पृथ्वी सम्मेलन–1992 सहित विभिन्न पर्यावरणीय संधियों और सम्मेलनों पर चर्चा की। उन्होंने भारत को अपनी प्रकृति एवं स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ने तथा स्मार्ट सिटी के साथ स्मार्ट विलेज के विकास पर बल दिया। कार्यक्रम में पधारे प्रो. कौशल किशोर, विभागाध्यक्ष शिक्षा विभाग, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय ने मन के उपनिवेश-मुक्तिकरण तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के आलोक में शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधारों की आवश्यकता पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल सूचना प्रदान करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों में रचनात्मकता और आलोचनात्मक चिंतन विकसित करना भी इसका उद्देश्य होना चाहिए। उन्होंने हिंदी भाषी विद्यार्थियों के समक्ष भाषा संबंधी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सकारात्मक भूमिका की सराहना की।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. रत्नार्थु मिश्रा व धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रश्मि गोरे ने किया। यह आयोजन निर्देशक डॉ.तनुजा भट्ट एवं सहायक निर्देशक डॉ.गोपाल सिंह के निर्देशन में संपन्न हुआ ।
इस आयोजन में डॉ.बद्री नारायण मिश्र, डॉ.प्रियंका मौर्या, डॉ.विमल सिंह, डॉ.कल्पना अग्निहोत्री, अनुपमा यादव, डॉ.स्नेह पांडेय, प्रिया तिवारी, डॉ.कुंवर कुलदीप सिंह चौहान समेत काफी संख्या में शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे ।

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