April 20, 2026

संवाददाता 
कानपुर।
  शहर में 100-200 रुपए में मिलने वाले सस्ते और ब्रांडेड जैसे दिखने वाले चश्मे लोगों के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, बिना जांचे-परखे फुटपाथ से खरीदे गए चश्मे आंखों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
एलएलआर अस्पताल की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी मोहन ने चेतावनी दी है कि घटिया लेंस वाले चश्मे मोतियाबिंद और रेटिना संबंधी बीमारियों का कारण बन सकते हैं। शहर के किदवई नगर, मोतीझील, घंटाघर, रावतपुर और कल्याणपुर जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में फुटपाथ पर चश्मे बेचे जा रहे हैं।
ये चश्मे सस्ते और आकर्षक जरूर होते हैं, लेकिन इनके लेंस की गुणवत्ता बेहद खराब होती है। डॉक्टरों के अनुसार, इनके लेंस में अक्सर गलत नंबर, खरोंच या विजुअल डिस्टॉर्शन होता है, जिससे आंखों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यही वजह है कि इन्हें पहनने के कुछ ही समय बाद सिरदर्द, आंखों में दर्द और भारीपन महसूस होने लगता है।
अधिकांश लोग यह मान लेते हैं कि काले रंग का चश्मा धूप से पूरी सुरक्षा देता है, जबकि यह पूरी तरह गलत है। डॉ. शालिनी मोहन के अनुसार यूवी सुरक्षा लेंस के रंग से नहीं, बल्कि उसमें मौजूद विशेष फिल्टर से मिलती है। बिना यूवी फिल्टर वाले चश्मे पहनने से आंखों की पुतलियां फैल जाती हैं, जिससे हानिकारक किरणें सीधे रेटिना तक पहुंच जाती हैं। इससे मोतियाबिंद और उम्र से जुड़ी आंखों की गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
हाल ही में एक युवा मरीज सन एलर्जी और लगातार सिरदर्द की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचा। जांच में पता चला कि वह जो चश्मा पहन रहा था, उसमें 0.5 का सिलेंडर नंबर था, जबकि उसे इसकी जानकारी ही नहीं थी।
डॉक्टरों के मुताबिक, ऐसे छोटे-छोटे नंबर भी आंखों पर बड़ा असर डालते हैं और लंबे समय में गंभीर परेशानी पैदा कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि चश्मा सिर्फ फैशन का साधन नहीं, बल्कि एक मेडिकल जरूरत है। इसे खरीदने के बाद किसी अनुभवी ऑप्टिशियन या नेत्र विशेषज्ञ से इसकी जांच जरूर करानी चाहिए।
डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि सस्ते चश्मे के चक्कर में आंखों की सेहत से समझौता करना भारी पड़ सकता है। बेहतर है कि प्रमाणित दुकानों से ही चश्मा खरीदें और उसकी गुणवत्ता, नंबर और यूवी प्रोटेक्शन की जांच जरूर कराएं।