March 5, 2026

संवाददाता
कानपुर।
पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार को केंद्र सरकार में इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फॉर्मेशन मंत्रालय के प्रबंध निदेशक एवं चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर के पद पर तैनात किया है। यूपी सरकार 1994 बैच के आईपीएस अखिल कुमार को जल्द एनओसी के साथ कार्यमुक्त कर देगी। इस प्रक्रिया में अभी एक महीने तक का समय लग सकता है।
पुलिस आयुक्त अखिल कुमार ने जमीनों पर कब्जे, रंगदारी जैसे गंभीर मामलों में कथित पत्रकारों, वकीलों के खिलाफ अभियान चलाया। एसआईटी बनाकर कार्रवाई की गई। ऑपरेशन महाकाल में अब तक कई बड़ी कार्रवाइयां हो चुकी हैं।
अखिल कुमार ने 4 जनवरी 2024 को कानपुर पुलिस कमिश्नर के रूप में चार्ज लिया था। इसके बाद उन्होंने शहर में ऑपरेशन महाकाल अभियान चलाकर अपराधियों के सिंडीकेट के खिलाफ कार्रवाई शुरू की।
कानपुर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष अवनीश दीक्षित को जेल भेजते हुए पूरे सिंडीकेट पर एक्शन लिया गया।
जमीनों पर कब्जे और रंगदारी का सिंडीकेट चला रहे कथित अधिवक्ता दीनू उपाध्याय समेत 12 से अधिक दागी अधिवक्ताओं को जेल भेजा गया।
ऑपरेशन महाकाल की सबसे बड़ी कार्रवाई करते हुए अधिवक्ता अखिलेश दुबे को जेल भेजा गया था।
सीनियर आईपीएस अखिल कुमार का नवंबर में डीजी रैंक पर प्रमोशन होना है। अखिल कुमार का करीब 4 महीने पहले केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए नाम चयनित हुआ था। केंद्र में प्रतिनियुक्ति का लेटर जारी हो गया है। अब चर्चा शुरू हो गई है कि अखिल कुमार के ट्रांसफर के बाद अब उनके ऑपरेशन महाकाल का क्या होगा।
इस ऑपरेशन के तहत जेल भेजे गए अधिवक्ता अखिलेश दुबे पर क्या अब कार्रवाई हो सकेगी…? उनके न रहने पर जांच को किस तरह से आगे बढ़ाया जाएगा। ऐसे कई सवाल कानपुर की जनता के बीच कौंध रहे हैं, लेकिन बता दें कि पुलिस कमिश्नर को यहां से रिलीव होने में अभी एक महीने तक का समय लग सकता है।
कानपुर पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार ने ऑपरेशन महाकाल के पहले चरण में अधिवक्ता अखिलेश दुबे को अरेस्ट करके जेल भेज दिया है। इसके बाद अब उन्होंने ऑपरेशन महाकाल-2 मंगलवार यानी 19 अगस्त को लॉन्च किया। 20 सेकेंड के जारी टीजर में पूरी जानकारी दी गई। जल्द ही अब शहर के दूसरे बड़े माफियाओं को भी पुलिस पकड़ेगी। इस बार सफेदपोश अपराधियों पर एक्शन होगा।
अखिलेश दुबे एक ऐसा वकील है, जिसने कभी कोर्ट में खड़े होकर किसी केस में बहस नहीं की। उसके दरबार में खुद की कोर्ट लगती थी और दुबे ही फैसला सुनाता था। वह सिर्फ अपने दफ्तर में बैठकर पुलिस अफसरों के लिए उनकी जांचों की लिखा-पढ़ी करता था। बड़े-बड़े केस की लिखा-पढ़ी दुबे के दफ्तर में होती थी।
इसी का फायदा उठाकर वह लोगों के नाम निकालने और जोड़ने का काम करता था। इसी डर की वजह से बीते 3 दशक से उसकी कानपुर में बादशाहत कायम थी। कोई उससे मोर्चा लेने की स्थिति में नहीं था।
अखिलेश दुबे ने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए सबसे पहले एक न्यूज चैनल शुरू किया था। इसके बाद वकीलों का सिंडीकेट बनाया। फिर इसमें कई पुलिस अफसरों को शामिल किया। कानपुर में स्कूल, गेस्ट हाउस, शॉपिंग मॉल और जमीनों के कारोबार में बड़े-बड़े बिल्डर उसके साथ जुड़ते चले गए।
दुबे का सिंडीकेट इतना मजबूत था कि उसकी बिल्डिंगो

पर केडीए से लेकर कोई भी विभाग आपत्ति नहीं करता था। कमिश्नर का दफ्तर हो या डीएम ऑफिस, केडीए, नगर निगम और पुलिस महकमे से लेकर हर विभाग में उसका मजबूत सिंडीकेट फैला था। उसके एक आदेश पर बड़े से बड़ा काम हो जाता था।
अखिलेश दुबे मूलरूप से कन्नौज के गुरसहायगंज का रहने वाला है। उसके पिता सेंट्रल एक्साइज में कॉन्स्टेबल थे। मेरठ में तैनात थे। वहां रहने के दौरान अखिलेश दुबे की सुनील भाटी गैंग से भिड़ंत हो गई। इसके बाद वह भागकर कानपुर आ गया।
अखिलेश दुबे किदवई नगर में किराए का कमरा लेकर रहने लगा। दीप सिनेमा के बाहर साइकिल स्टैंड चलाता था। इस दौरान मादक पदार्थ तस्कर मिश्री जायसवाल की मादक पदार्थ की पुड़िया बेचने लगा। धीरे-धीरे वह आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो गया।