April 28, 2026

संवाददाता
कानपुर। आज से ठीक एक साल पहले 22 अप्रैल को पहलगाम आतंकी हमला हुआ था। आतंकियों ने नाम और मजहब पूछकर 26 लोगों की हत्या की थी।
कानपुर के रहने वाले 30 साल के शुभम द्विवेदी को उनकी पत्नी ऐशान्या के सामने सिर में गोली मारी गई। घटना के दो महीने पहले ही शुभम-ऐशान्या की शादी हुई थी।
आतंकी हमले के एक साल बाद भी शुभम को याद करके  ऐशान्या की आंखों में आंसू आ जाते हैं। ऐशान्या कहती हैं- न एनिवर्सरी मना पाई, न कोई त्योहार। अब तो बस यादें ही हैं और रही बात जस्टिस की तो जब तक आतंकवाद जड़ से खत्म नहीं हो जाता, चैन नहीं मिलेगा।
शुभम के पिता संजय द्विवेदी ने ऑफिस में बेटे की तस्वीर लगा रखी है, जिसे निहारने के बाद ही कुर्सी पर बैठते हैं। हर महीने गांव में शुभम के नाम से भोज भी कराते हैं।
इस घटना को याद करके ऐशान्या ने कहा- जब मां-बाप के सामने बेटा दुनिया से चला जाए, इससे बड़ा दुख नहीं हो सकता। जिसकी शादी के दो महीने हुए हों, उसके सामने ही पति को आतंकियों ने मार दिया, उसे कैसे भूल सकते हैं। अब तो ये पूरी जिंदगी का दर्द है।
ऐशान्या पूरी घटना को याद करके भावुक हो जाती हैं। कहती हैं कि हम पिछले साल 17 अप्रैल को घूमने निकले थे। इस साल उस तारीख से ही मैं लगातार उन पलों को याद कर रही हूं। उस समय की तस्वीरें देख रही हूं। उन तस्वीरों को देखकर लगता है कि हम कितने खुश थे, लेकिन बीते 22 अप्रैल ने मेरा सब कुछ खत्म कर दिया।
ऐशान्या बताती हैं कि लाइफ पार्टनर के सामने उनके हसबैंड को छीन लिया जाए, मार दिया जाए, तो उसे कोई नहीं भूल सकता। ये लाइफ लॉन्ग ट्रॉमा है। हसबैंड के साथ 26 लोग थे, पतियों को पत्नियों के सामने मार दिया गया। ये पूरी जिंदगी का दर्द है। इसे मैं नहीं भूल सकती।
ऐशान्या बताती हैं कि जब आप किसी को खो देते हो तो हर दिन मुश्किल हो जाता है। चाहे त्योहार हो या एनिवर्सरी। हमारी शादी को दो महीने ही हुए थे। मैंने उसके साथ कोई एनिवर्सरी नहीं मनाई, न ही कोई त्योहार। जब कभी कुछ अच्छा काम करती हूं, तो बताने का मन होता है, फिर लगता है किसे बताऊं।
ऐशान्या का कहना है कि परिवार अगर साथ है तो सबसे बड़ी मजबूती यही है। मेरे सास-ससुर के साथ मुझे मेरे माता-पिता का भी साथ मिला। इस वजह से हम ये सब कुछ सह पाए। साथ रहने की वजह से ही हम मजबूत हुए।
ऐशान्या कहती हैं- पीएम मोदी से दोबारा मुलाकात तो नहीं हुई, लेकिन सीएम हमारे यहां आए थे। फिर मेरे ससुर, शुभम के पिता जून-जुलाई 2025 में सीएम से मिले थे। कई बार फोन पर भी बात हुई। सीएम से मुलाकात के प्रयास हैं, लेकिन बंगाल चुनाव की वजह से अभी मुलाकात नहीं हो सकी है। लेकिन, मुझे उनसे मिलना है, मैं प्रयास कर रही हूं।
ऐशान्या का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद ऑपरेशन महादेव भी हुआ था, जिसमें पहले आतंकी ठिकानों को नष्ट किया गया था। ऑपरेशन महादेव में उन्हें खत्म किया गया, जिन आतंकियों ने ये किया था। सूचनाएं मिलती रहती हैं कि अन्य ठिकानों पर भी कश्मीर में सैन्य ऑपरेशन किए जाते रहते हैं। दोनों ही ऑपरेशन एक तरह की राहत हैं, लेकिन जब तक पूरी तरह से आतंकवाद खत्म नहीं होगा, तब तक फुल राहत नहीं मिलेगी।
ऐशान्या कहती हैं- ये इसे सिर्फ आतंकी हमला नहीं, बल्कि हिंदू जेनोसाइड है। क्योंकि वहां हिंदू धर्म को टारगेट करके, उन्हें कलमा पढ़ने के लिए मजबूर करके मारा गया था। वहां पूछा गया कि हिंदू हो या मुसलमान। मुसलमान हो तो कलमा पढ़ो, फिर उन्हें टारगेट किया गया। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। आतंकवादी बहुत घिनौनी सोच वाले होते हैं, ये इंसान नहीं हैं। हमारे पुराणों में राक्षस होते थे, ये वही राक्षस हैं। ये एक ही धर्म विशेष समुदाय से ही क्यों हैं, इसका जवाब मेरे पास नहीं है। लेकिन, ये सवाल जरूर होना चाहिए कि आपका देश पहले है या आपका धर्म।
ऐशान्या बताती हैं कि विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना हमारे परिवार के संपर्क में लगातार रहे हैं। उन्होंने शुभम के पैतृक गांव में गेट भी बनवाया था। जब वो उसका शिलान्यास करने आए थे, तो कहा था कि विधानसभा की डिजिटल लाइब्रेरी में शुभम की एक बायोपिक भी लगवाएंगे। शुभम की यादों को संजोने के लिए हर प्रयास किए जा रहे हैं। हम दो दिन पहले ही उनसे मिलकर आए। फोन पर भी बात होती रहती है। वही एक इंसान हैं, जो लगातार हमारे संपर्क में हैं। एक पार्क का टेंडर हो गया है, कुछ टेक्निकल चीजें फंसी हैं। उनके पूरा होते ही पार्क का काम शुरू होगा। बाकी चीजों के बारे में अभी कोई जानकारी नहीं है।
शुभम के पिता संजय द्विवेदी उन पलों को याद कर कहते हैं, बेटे की शादी के दो ही महीने हुए थे। दोनों परिवारों ने मिलकर खुशी-खुशी बच्चों का कश्मीर जाने का प्लान किया था।
लेकिन, परिवार के साथ ऐसी घटना होगी, ये सपने में भी नहीं सोचा था। इसके बाद जो हुआ, हमारे और परिवार के लिए इससे बड़ा दुख कुछ हो ही नहीं सकता। हर दिन उसकी याद आती है, लेकिन ईश्वर आपको जैसे रखेगा, वैसे ही रहना होगा।
22 अप्रैल को कानपुर में शुभम को श्रद्धांजलि देने के लिए एक कार्यक्रम भी किया जा रहा है। कानपुर के लोगों ने जो साहस, सहयोग और ताकत हमें दी है, उससे हम उस दुख को झेल पाए हैं।
संजय द्विवेदी कहते हैं कि 26 फरवरी को शुभम के जन्मदिन और 12 फरवरी को जिस दिन उसकी शादी हुई थी, उस दिन उसकी बहुत ज्यादा याद आई। सबसे ज्यादा दिक्कतें शुभम की मां को संभालने में हुईं। शुभम की याद से किसी को दूर तो नहीं ले जा सकते हैं, लेकिन फिर भी किसी तरह से उन्हें संभाला।
पिता संजय द्विवेदी बताते हैं कि हर महीने की 22 तारीख को हम अपने गांव में शुभम के नाम से भोज भी कराते हैं, इसलिए उस तारीख को लगता है कि शुभम को गए हुए कितने महीने बीत गए।
संजय द्विवेदी बताते हैं कि विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना हमारे परिवार के काफी करीब हैं। जब मैं कश्मीर से शुभम को लेकर आ रहा था, तो सीएम ने भी मुझे फोन किया। सरकार ने हमारी बहुत मदद की।
सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर किया, जिससे हमें संतुष्टि तो मिली ही, साथ ही शुभम की आत्मा को शांति मिली होगी। मैंने पीएम से मांग रखी थी कि वो हमला देश पर हमला था, जिसमें 26 लोगों को आतंकियों ने मार दिया था। इसलिए हमने उन्हें शहीद का दर्जा देने की मांग की थी। हम अब भी उस मांग को कर रहे हैं।
उस दौरान कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने मुलाकात की थी और मेरी मांग को भी रखा था। यहां तक कि राहुल गांधी ने कहा था कि इसके लिए वो पीएम को पत्र भी लिखेंगे। रही बात अखिलेश यादव की, तो वो मिलने नहीं आए, क्योंकि उन्होंने कह दिया था कि हम सवर्ण जाति से आते हैं, वो नहीं आएंगे। वो केवल मुस्लिमों और पीडीए के लोगों के यहां जाते हैं। हमसे उन्हें मतलब नहीं है।

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