• 70 फीसदी बच्चे सोशल मीडिया की गिरफ्त में।

संवाददाता
कानपुर। क्या आपका बच्चा भी घंटों मोबाइल की स्क्रीन पर अंगूठा घिसता रहता है? क्या रील देखते समय उसे टोकने पर वह चिड़चिड़ा हो जाता है या चिल्लाने लगता है? अगर हाँ, तो यह सामान्य बात नहीं है।
एलएलआर अस्पताल के मनोरोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय चौधरी के मुताबिक, सोशल मीडिया की लत बच्चों के मानसिक विकास को दीमक की तरह चाट रही है। ताज़ा आंकड़े डराने वाले हैं। शहर के करीब 70 फीसदी बच्चे इस समय सोशल मीडिया और मोबाइल की गिरफ्त में हैं।
डॉ. धनजंय चौधरी बताते हैं,कि जब बच्चा बार-बार रील बदलता है, तो उसके मस्तिष्क में डोपामाइन नाम के हार्मोन का भारी स्राव होता है। यह हार्मोन उसे तुरंत खुशी का अहसास कराता है। यह सुख पढ़ाई या खेलकूद से मिलने वाली खुशी से कहीं ज्यादा तीव्र और कृत्रिम होता है। यही वजह है कि बच्चा किताब छोड़कर रील की दुनिया में खो जाना चाहता है।
एक मामले में कल्याणपुर निवासी एक 12 वर्षीय छात्र को गेमिंग और रील्स की ऐसी लत लगी कि उसने खाना-पीना तक कम कर दिया। जब मां ने मोबाइल छीना, तो बच्चे ने न केवल उन पर हाथ उठाया बल्कि खुद को कमरे में बंद कर लिया।
हैलेट अस्पताल के मनोरोग ओपीडी पहुंचे परिजनों ने बताया कि बच्चा स्कूल जाने से भी कतराता था और हर समय गुमसुम रहता था। डॉ. धनंजय चौधरी के अनुसार, यह ‘विड्रॉल सिम्पटम्स’ का गंभीर मामला था। इसमें बच्चे का थेरेपी के जरिए उपचार किया गया और अब उसकी हालत में सुधार भी है।
दूसरे मामले में किदवई नगर की एक 15 साल की छात्रा रात-रात भर रील देखने और उन्हें एडिट करने की आदी हो गई थी। धीरे-धीरे उसे नींद आना भी बंद हो गई थी। जांच में सामने आया कि लगातार स्क्रीन के संपर्क में रहने से उसके शरीर में मेलाटोनिन बनना बंद हो गया था। अब उसे कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी दी जा रही है। ताकि उसका ‘स्लीप साइकल’ सुधारा जा सके।
आजकल बच्चे असली दोस्तों के साथ मैदान में खेलने के बजाय मोबाइल की वर्चुअल दुनिया में सिमट गए हैं।
डॉ. चौधरी ने चेतावनी दी है कि इससे बच्चों में ‘वर्चुअल ऑटिज्म’ के लक्षण दिख रहे हैं। वे लोगों से नजरें मिलाने और बातचीत करने में हिचकिचाने लगे हैं। उनकी सोशल स्किल खत्म हो रही है।
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन को बनने से रोकती है, जिससे बच्चों की नींद का चक्र पूरी तरह बिगड़ चुका है। वहीं, रील पर खुद को अलग दिखाने की होड़ बच्चों को जानलेवा स्टंट करने पर मजबूर कर रही है। इसमें मेल हार्मोन टेस्टोस्टेरोन की बड़ी भूमिका होती है, जो उनमें आक्रामकता और जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ा देता है।
अक्सर माता-पिता अपना काम निपटाने या बच्चे को चुप कराने के लिए उसके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं। खाना खिलाते समय मोबाइल दिखाना अब एक सामान्य चलन बन गया है। विशेषज्ञ इसे सबसे घातक मानते हैं। यही ‘शॉर्टकट’ आगे चलकर बच्चे के व्यवहार में बदलाव और गंभीर लत का कारण बन रहा है।
डॉक्टरों की सलाह है कि बच्चे के लिए मोबाइल का समय तय करें। खाना खाते समय बच्चे को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखें। अगर बच्चा मोबाइल छीनने पर हिंसक हो रहा है, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।
गंभीर मामलों में विशेषज्ञ दवाओं और कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी के जरिए बच्चों के व्यवहार को दोबारा पटरी पर लाते हैं।






