भ्रष्टाचार में लिफ्ट रहे उपाध्यक्ष गोपाल शर्मा को एक बार फिर से चयन प्रक्रिया में किया गया शामिल
संवाददाता।
कानपुर। माना जाता है कि अगर बिल्ली को दूध की रखवाली सौंपी जाए, तो यह अपेक्षा करना व्यर्थ है कि दूध सुरक्षित रहेगा। यहां बिल्ली को दूध की रखवाली सौंपना, ऐसी स्थिति का प्रतीक है जहां विश्वास की जिम्मेदारी उसी पर डाली जाती है जो उसे अपने रंग में रंगने की कोशिश भी कर सकता है।
इस कहावत का उपयोग तब किया जाता है जब किसी ऐसे व्यक्ति को किसी महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी दी जाती है, जिसके लिए वह उपयुक्त नहीं होता। अब ऐसा उत्तसर प्रदेश क्रिकेट संघ में देखने को मिलेगा जहां लगभग ढाई दशक पहले भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए पूर्व भारतीय टीम के सदस्य और संघ में अहम पदों पर आसीन रहे गोपाल शर्मा एक बार चयन प्रक्रिया पर अपना नियन्त्रण रखेंगे। उन्हेऔ अब सीनियर व जूनियर क्रिकेट टीमों के चयन पर अपनी पैनी आंख रखने के लिए नियुक्तय किया गया है। मान लीजिए एक कंपनी में एक ऐसे व्यक्ति को चयन प्रक्रिया पर नियन्त्र ण रखने की जिम्मेदारी दी गई, जिसका इतिहास पहले से ही चयन प्रक्रिया में खिलाडियों से पैसे लेने का रहा हो और वह पूरी तरह से उसका दुरुपयोग कर रहा चुका हो या फिर कर रहा हो। बिल्ली से दूध की रखवाली?” कहावत हमें यह भी सिखाती है कि हमें जिम्मेदारियाँ सोच-समझकर और उपयुक्त व्यक्ति को सौंपनी चाहिए। बल्कि उस व्यक्ति को जिम्मेदारी सौंपने से पहले उसके बारे में पूरी तहकीकात भी की हो और यह स्प्रष्ट हो कि उस व्यक्ति ने कोई भी नियम विरुद्ध कार्य न किया हो। गोपाल शर्मा को प्रदेश क्रिकेट संघ में चयन प्रक्रिया वाली जिम्मे्दारी की खबर प्र्रकाशित होते ही क्रिकेट जगत में उनके भ्रष्टाचारी योगदान को लेकर चर्चा बढ गयी कि जिसके भ्रष्टाचार के चलते गोपाल को प्रदेश संघ छोडना पडा था आज वह उसी को समाप्त करने के लिए नियुक्त कर दिए गए हैं। गौरतलब है कि 1997-98 में प्रदेश के कई क्रिकेटरों ने निवर्तमान सेलेक्टर्स के रूप में संघ में कार्य कर रहे गोपाल शर्मा और शशिकान्त खाण्डेकर के खिलाफ क्रिकेटरों से चयन करने के बदले पैसों की मांग का कोर्ट में हलफनामा पेश किया था। जब यह बात जगजाहिर हुयी तो निवर्तमान प्रदेश संघ के सचिव स्व. ज्योति बाजपेयी और बोर्ड सचिव स्व जगमोहन डालमियां को उनके बचाव में उतरना पडा था। पूर्व प्रदेश सचिव का बोर्ड सचिव पर इतना अधिक दबाव था कि उन्हे कलकत्ता (अब कोलकाता) में एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स करनी पडी थी। यही नही दोनों को क्लीन चिट देने का दबाव भी काम आ गया था। ऐसे में क्रिकेट जगत में कौतूहल का विषय बन गया है जब रिश्वत के आरोपी को एक बार फिर से जिम्मेदारी दी गयी है तो क्या गांरन्टी है कि अब चयन प्रक्रिया पारदर्शी रहेंगी। यूपीसीए से जुडे रहे एक पूर्व क्रिकेटर ने इस बारे में थोडी जानकारी देते हुए कहा कि संघ अपने ही बुने जाल में फंसता दिखायी दे रहा है। इन बातो से यह प्रतीत होता है कि प्रदेश की चयन समिति पूरी तरह से भ्रष्टाचार में लिप्त रही है तभी तो उन पर अब सर्वे-सर्वा के रूप में गोपाल शर्मा का चयन किया गया है। उन्होंने कहा कि गोपाल शर्मा की नियुक्ति के बाद भी ये सब चीजें शायद रुकने वाली नही हैं ये केवल भ्रष्टाचारी कार्यों पर परदा डालने जैसा है। यूपीसीए के सूत्र बतातें हैं कि कुछ भी रुकने वाला नही है चयन प्रक्रिया में शामिल ठेकेदार और उनके एजेन्ट अपना कार्य बखूबी करतें रहेंगे। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि जब गोपाल शर्मा को ही चयन प्रक्रिया देखनी है तो फिर चयनकर्ताओं पर हर साल इतना खर्च क्यो वहन किया जा रहा है। । इस स्थिति में कहा जा सकता है कि यह “बिल्ली से दूध की रखवाली” जैसा है। इस मामले में यूपीसीए का कोई भी सदस्य या पदाधिकारी कुछ भी बोलने को तैयार नही है।






