संवाददाता।
कानपुर। नगर में बढ़ रहे प्रदूषण के कारण फेफड़ों के संक्रमण के साथ अब गले का भी संक्रमण बढ़ने लगा है। कानपुर मेडिकल कॉलेज में ऐसे मरीजों की संख्या में करीब 20 से 25% इजाफा हुआ है। रोजाना मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। प्रदूषण में घूमने के कारण गला चोक होना, सांस लेने में दिक्कत होना, खाते समय कोई चीज गले में अटकना जैसी तमाम शिकायतें लेकर मरीज आ रहे हैं। कानपुर मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. विशाल कुमार गुप्ता ने बताया कि इन दिनों ठंडी हवा चलने से वायरस काफी एक्टिव हो गए हैं। यह वायरस आपके फेफड़े और गले को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे में जरा सी लापरवाही मरीजों की जान की आफत बन सकती हैं। प्रदूषण बढ़ने के साथ-साथ वायरस भी अटैक कर रहा है। इस कारण अस्थमा के मरीजों की संख्या भी बढ़ गई है। रोजाना लगभग 300 के करीब मरीज ओपीडी में आ रहे हैं। डॉक्टर के मुताबिक इमरजेंसी में आने वाले मरीजों की हालत ज्यादा गंभीर होती है। ऐसे रोजाना 8 से 10 मरीजों को भर्ती करना पड़ता है, जो भी मरीज आ रहे हैं उनको सांस से संबंधित दिक्कत हो रही हैं। वो अधिकतर अस्थमा के पुराने मरीज हैं या फिर सीओपीडी के मरीज होते हैं। कभी-कभी मरीज मेडिकल स्टोर से दवा लेकर खाते हैं और फिर अचानक हालत बिगड़ने पर अस्पताल भागते हैं। इसलिए मेडिकल स्टोर से दवा लेकर ना खाएं, डॉक्टर से परामर्श लेने के बाद ही दवा का सेवन करें। खास तौर पर वह मरीज इस बात का ज्यादा ख्याल रखें जो पहले से ही सांस की दिक्कत झेल रहे हैं। डॉक्टर के मुताबिक नवम्बर महीने में सुबह और शाम ठंड की वजह से मरीजों की संख्या बढ़ने लगी है। ठंड लोगों को नुकसान कर रही है। ऐसे में अगर आपने ठंड को नजर अंदाज किया तो आपके लिए मुसीबत बन सकती है। डॉ. विशाल कुमार गुप्ता ने बताया कि हमें शुरुआती ठंड से काफी बचना चाहिए, क्योंकि दिन का तापमान अलग होता है और रात का तापमान अलग होता है। ऐसे में बॉडी को संतुलन बनाने में थोड़ा समय लगता है। इसलिए ऐसे समय में संभल कर रहने की जरूरत है। डॉ. विशाल कुमार गुप्ता ने बताया कि इन दिनों सीओपीडी के मरीज सबसे ज्यादा है। सीओपीडी के वह मरीज होते हैं जो कि सिगरेट, बीड़ी, हुक्का आदि का सेवन करते हैं, जब मौसम बदलता है या यह कह लें की ठंड का मौसम आता है तो सबसे पहले इन मरीजों में असर देखने को मिलता है। ऐसे लोगों के अंदर फेफड़े कमजोर होते हैं और संक्रमण इनमें तेजी से फैलता है। इन लोगों के संक्रमण गले में और फेफड़े दोनों में हो सकता है। जब सांस की नली मोटी हो जाती है तो फिर मरीज को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। ऐसे में उसे घबराहट और उलझन होती है। डॉ. विशाल कुमार गुप्ता ने बताया कि इस समय ऐसे भी मरीज आ रहे हैं, जिनको ब्रोंकाइटिस की भी समस्या है। यह समस्या तब होती है जब धूल बढ़ जाती है और जिन लोगों को धूल से एलर्जी है उनके अंदर यह समस्या ज्यादा होती है। ऐसे में मरीज को खांसी आना, ज्यादा खांसी आने पर गले से खून आ जाना, लंबी-लंबी सांस लेना अन्य तरह की समस्या होने लगती है। डॉ. विशाल ने बताया कि इस समय फुल आस्तीन के कपड़े पहने। सुबह और शाम की ठंड से बचे। ठंडा पानी बिल्कुल भी ना पिए, बल्कि जब भी पानी पिएं तो उबला हुआ पानी पिएं। ज्यादा सुबह उठकर टहलने ना जाए क्योंकि उस समय प्रदूषण ज्यादा होता है और ठंड भी होती है। हल्की सी धूप निकलने के बाद टहलने जाएं।






