February 13, 2026

आ स. संवाददाता 

कानपुर। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के शिकायती प्रकोष्ठ विभाग ने  उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ के पूर्व सचिव और मेरठ  विश्वविद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य के साथ प्रबन्धतन्त्र के खिलाफ की गयी शिकायतों को गंभीरता से  लिया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ओर से सभी के खिलाफ जाँच के निर्देश जारी कर दिए हैं। शुक्रवार को नई दिल्ली स्थित विभाग के मुख्यालय से जारी निर्देश के बाद जहां मेरठ विश्वविद्यालय प्रबंधतंत्र में हडकम्प मच गया हैं वहीं पीडित और शिकायतकर्ता के माथे पर पडे बल दूर हो गए हैं।  

शिकायतकर्ता प्रो. मीना राजपूत ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में मेरठ कालेज में चल रहे उच्च शिक्षा में भ्रष्टाचार, अवैध नियुक्ति, महिला शिक्षकों के शोषण और प्राचार्य की तानाशाही के विरुद्ध शिकायत दर्ज करवायी थी।  उन्होनें पिछले कई वर्षों से भ्रष्टाचार और शोषण के विरुद्ध आवाज उठायी लेकिन उनकी सुनवायी नही हुई,बल्कि उनको उनके परिवार के साथ प्रताड़ना का शिकार होना पड़ गया। 

प्रो. मीना राजपूत ने बताया कि  डॉ. युद्धवीर सिंह मेरठ कॉलेज व यूपीसीए समेत दो स्थानों से वेतन ले रहे हैं, जबकि यह एक प्रकार का अपराध है। मेरठ के विश्वविद्यालय के प्राचार्य हिटलर बनकर उसे संचालित कर रहें हैं जिसके लिए 2.5 लाख रूपये वेतन मिलता है।उन्होनें बताया कि 90–100% गणित परिणाम के बाद भी राजनीति का शिकार बनाया गया।  क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाना अपराध है?  बायोमैट्रिक उपस्थिति प्रिंसिपल के लिए जरूरी क्यों नहीं। उन्हो्नें विभाग के अधिकारियों से मांग की थी कि इस प्रकार के क्रियाकलापों में लिप्त प्रोफेसरों के खिलाफ सरकार आदेश जारी करे, कि अनुमोदित शिक्षकों को निलंबित कर दिया जाए या उन्हें भीख मांगने या मजदूरी के लिए निर्देशित करे। उन्होनें सरकार से प्रार्थना की थी कि दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष और सख्त जांच कराई जाए। यही नही अनुमोदित शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन व सुविधाएं दी जाएं।  महिला शिक्षकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। यदि सरकार हस्तक्षेप नहीं करती, तो यह संकेत होगा कि ईमानदारी और साहस अब अपराध बन चुके हैं।

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