January 30, 2026

• सीएसए विकसित कर रहा तकनीक।

संवाददाता
कानपुर।
उत्तर प्रदेश में खेती-किसानी के पारंपरिक तरीके अब तेजी से बदलने जा रहे हैं। जिस तरह इंसान अपनी सेहत की जांच के लिए ब्लड प्रेशर और शुगर टेस्ट कराता है, उसी तर्ज पर अब किसान अपनी जमीन की सेहत भी मोबाइल पर जान सकेंगे। 

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति के. विजयेंद्र पांडियन ने बताया कि विश्वविद्यालय एक ऐसी आधुनिक तकनीक और मोबाइल ऐप विकसित कर रहा है, जो किसानों के लिए डॉक्टर और सलाहकार—दोनों की भूमिका निभाएगा। इस पहल से खेती को वैज्ञानिक आधार मिलेगा और किसान समय रहते सही फैसले ले सकेंगे।
कुलपति ने बताया कि तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने कोयंबटूर में तकनीक के जरिए किसानों को मिट्टी की सेहत से जोड़कर बड़ा बदलाव किया है। दक्षिण भारत में बीते एक दशक से किसान मिट्टी परीक्षण और पोषण प्रबंधन को गंभीरता से अपनाते आ रहे हैं, जिसमें यूनिवर्सिटीज और कृषि विज्ञान केंद्रों की अहम भूमिका रही है। अब इसी मॉडल को उत्तर प्रदेश में लागू किया जा रहा है। पहले जहां किसान व्यक्तिगत स्तर पर मिट्टी की जांच कराते थे, वहीं अब ‘ग्रीटिका सिस्टम’ के जरिए बड़े पैमाने पर और अधिक सटीक जांच संभव होगी।
फिलहाल सॉइल हेल्थ कार्ड मैनुअल तरीके से बनाए जाते हैं, जिसमें समय लगने के साथ पारदर्शिता की भी दिक्कत रहती है। नई व्यवस्था में इसे जीआईएस आधारित डिजिटल डेटा में बदला जाएगा। पूरा सिस्टम कंप्यूटराइज्ड होगा, जिससे किसान की जमीन का रिकॉर्ड सुरक्षित रहेगा। किसान मोबाइल ऐप पर लॉगिन कर यह जान सकेगा कि उसकी मिट्टी में किस पोषक तत्व की कमी है और कौन सी खाद कितनी मात्रा में डालनी चाहिए। इससे अनावश्यक खर्च घटेगा और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहेगी।
इस डिजिटल पहल की सबसे बड़ी ताकत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस होगी। फसल में कीट या बीमारी लगने पर किसान को बस मोबाइल से फोटो खींचनी होगी। ऐप फोटो का तुरंत विश्लेषण कर बताएगा कि यह कौन सा कीट या रोग है और उसके लिए कौन सी दवा सबसे प्रभावी रहेगी। इतना ही नहीं, फसल के रंग और बनावट के आधार पर यह तकनीक पोषक तत्वों की कमी की जानकारी भी दे सकेगी, जिससे किसान समय पर सुधार कर पाएंगे।
यह ऐप केवल सलाह देने तक सीमित नहीं रहेगा। जैसे ही किसान समस्या अपलोड करेगा, नजदीकी एक्सटेंशन सेंटर के कृषि वैज्ञानिक सक्रिय होकर उससे सीधे संपर्क करेंगे और वैज्ञानिक समाधान बताएंगे। विश्वविद्यालय समय-समय पर विशेष कैंप भी लगाएगा, जहां फसल उत्पादन से लेकर मार्केटिंग तक की समस्याओं का समाधान किया जाएगा। 

कुलपति के. विजयेंद्र पांडियन के अनुसार, यह डिजिटल बदलाव किसानों की आमदनी बढ़ाने और खेती को लाभ का सौदा बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।