—वर्षों से चली आ रही परंपरा, अनुराधा नक्षत्र में धूमधाम से मनाया जाता है रंगों से भरा पर्व।

संवाददाता
कानपुर। नगर का होली गंगा मेला आज अपना 85 वाँ वर्ष पूरा कर रहा है कानपुर नगरवासियों की आत्मा में बसा यह मेला आज भी जवान ही दिखता है। आजादी के मतवालों के लिए मनाया जाने वाला यह दिन आज भी युवाओं में जोश भरते हुए एक राष्ट्रीय भावना और शक्ति प्रदान कर देता है।होली के बाद अनुराधा नक्षत्र वाले दिन सुबह रज्जन बाबू पार्क में जैसे ही राष्ट्र ध्वज फहराया जाता है और जन गण मन का गान होता है वैसे ही उपस्थित युवा, शक्ति से ओतप्रोत एक दूसरे को आजादी का अहसास कराते हुए गुलालों और रंगों से रंगना शुरू कर देते हैं।
गौरतलब है कि अंग्रेजी हुकूमत के समूल विनाश करने के लिए जो गदर 1857 में शुरू हुई थी।वो शनै: शनै: सम्पूर्ण भारत वर्ष में विस्तार लेती गई। नगर से आजादी की अलख जगाने वालों को जब अंग्रेजी हुक्मरानों ने दबाने का काम किया तो वह चाल उन्हीं पर उल्टी पड़ गई थी।
साल 1942 में जब क्रांतिकारियों को होली खेलने से रोका गया, तो उन्होंने झुकने के बजाय विरोध का रास्ता चुना। कई लोग जेल गए, लेकिन शहर का उत्साह थमा नहीं। होली की मस्ती निरंतर कई दिनों तक सड़कों पर चलती रही और जब सातवें दिन अंग्रेजी हुकूमत के नतमस्तक होते क्रांतिकारी रिहा हुए, तब उन्हीं क्रान्तिकारियों के साथ पूरे शहर के लोगों ने रंग खेलते हुए गंगा किनारे एक साथ रंग खेलते हुए जाकर होली का जश्न मनाया था। तभी से इस परंपरा को गंगा मेले के रूप में आगे बढ़ाया गया जो अभी तक जारी है। बताते चलें कि शहर के विभिन्न इलाकों से लोग रंग-गुलाल और अबीर के साथ जुलूस निकालते हुए आते हैं और गंगा मेले में शामिल होते हैं। मेले में हजारों की संख्या में लोग एकत्र होकर रंगों की होली खेलते हैं और स्वतंत्रता संग्राम के उन वीरों को याद करते हैं जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई थी।
आज भी इस अवसर पर हटिया से रंगों से सजा ठेला जुलूस निकलता है और शाम को गंगा तट स्थित सरसैयाघाट पर गंगा मेला आयोजित किया जाता है जिसमे शासन प्रशासन राजनीतिक पार्टियों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों, समाज सेवी संस्थाओं द्वारा स्टाल लगाये जाते है । जिसमे स्वल्पाहार की व्यवस्था सहित गुलाल लगाकर गले मिलते हुए होली मिलन समारोह मनाया जाता है।
मंगलवार को रज्जन बाबू पार्क, हटिया से पारंपरिक रंगों का ठेला जुलूस निकलेगा। सुबह 9:30 बजे डीएम और पुलिस कमिश्नर तिरंगा फहराएंगे, क्रांतिकारियों के शिलालेख पर पुष्पांजलि अर्पित करेंगे और रंग के ठेले को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे।
कानपुर हटिया होली गंगा मेला महोत्सव कमेटी के अध्यक्ष ज्ञानेंद्र विश्नोई ने बताया कि इस मेले की शुरुआत वर्ष 1942 में हुई थी। इस साल यह परंपरा अपने 85वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। रंग का ठेला रज्जन बाबू पार्क से निकलकर जनरलगंज, बजाजा, मेस्टन रोड, चौक, रोटी बाजार, कोतवाली चौराहा, कमला टावर और बिरहाना रोड होते हुए नयागंज के रास्ते वापस रज्जन बाबू पार्क पहुंचकर समाप्त होगा। इसके बाद शाम को सरसैया घाट पर गंगा मेला आयोजित किया जाएगा। इस बार मेले में भैंसा ठेले के बजाय छोटे लोडरों में रंगों के 30ड्रमों से हुरियारे सारे रास्ते सभी को रंगों में भिगोएंगे जबकि रंगों के ठेलों के साथ 7 ऊंट, 6 घोड़े, 8 ट्रैक्टर,6 लोडर, 5 बैटरी रिक्शा,3 रिक्शा लोडर आदि के साथ दुपहिया वाहनों के भी शामिल होने की संभावना है।

गंगा मेला समिति के पदाधिकारियों के अनुसार इस आयोजन में हर वर्ष बड़ी संख्या में हुरियारे और शहरवासी शामिल होते हैं। ढोल-नगाड़ों, रंग-गुलाल और उत्सव के माहौल के बीच यह मेला कानपुर की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन चुका है।
शहर के लोगों का मानना है कि गंगा मेला केवल रंगों का त्योहार नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की यादों से जुड़ी एक ऐतिहासिक परंपरा है। यही कारण है कि आज भी लोग पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ इसमें भाग लेते हैं और शहर की इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं। समय के साथ गंगा मेला भी आधुनिक रंग में ढलता जा रहा है। पारंपरिक आयोजनों के साथ कई नई परंपराएं भी जुड़ गई हैं। इस दिन बिरहाना रोड पर मटकी फोड़ प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। इसके अलावा शहर भर के होलियारे हटिया और बिरहाना रोड पर पहुंचते हैं। यहां रंग खेलने के साथ आंशिक कपड़ा फाड़ होली भी खेली जाती है। वहीं शहर के कई स्थानों पर डीजे और अन्य सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए गंगा मेले का उत्साह और भी बढ़ जाता है। शाम को रज्जन बाबू पार्क में बच्चों के लिए मेले का आयोजन होता है जिसमे अनेकों स्वल्पाहार और झूले निशुल्क होते है।
गंगा मेला आयोजन समिति में प्रमुख रूप से ज्ञानेंद्र विश्नोई अध्यक्ष, विनय सिंह महामंत्री, रोहित बाजपेई कोषाध्यक्ष, कार्यकारणी सदस्य उत्तम बाजपेई, संदीप मिश्रा आदि हैं।






