March 7, 2026

• भूखे बच्चों की ये स्थिति है कोई खाना या समोसा बांटने आया तो बच्चे उनकी तरफ दौड़ पड़ते हैं।

संवाददाता
कानपुर।
  गंगा के जलस्तर ने 14 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। 2011 के बाद गंगा बैराज पर जलस्तर 115 मीटर पहुंच गया है। बैराज पर खतरे के निशान पर गंगा पहुंच गई है। दूसरी तरफ गंगा किनारे बसे 16 गांव बाढ़ के पानी से प्रभावित हैं। करीब 500 परिवार बैराज से बिठूर जाने वाली सड़क पर पालीथीन से तंबू बनाकर रह रहे हैं।
इसके साथ गांव में लोग घर में ताले लगा कर निकल गए हैं। उनका कहना है कि किसी भी तरह से तिरपाल की व्यवस्था प्रशासन ने नहीं कराई। लेकिन, तिरपाल के लिए लेखपाल ने नाम जरूर नोट कर लिए हैं।
भूखे बच्चों की ये स्थिति है कि कुछ लोग खाना या समोसा बांटने के लिए आते हैं, तो बच्चे उनकी तरफ दौड़ पड़ते हैं। लोगों ने बताया की शाम 3 बजे प्रशासन के द्वारा खाना मिलता है।
जिन गांवों में पानी घरों में घुस गया है। वहां के हालात बदतर हो चुके हैं। खेती किसानी पूरी तरह से बर्बाद हो गई। गांव वालों का कहना है कि हजारों बीघा फसल बर्बाद हो गई कई घर पूरी तरह से तबाह हो गए यहां तक जिन घरों में लोग रहते है। पानी भरने के कारण लोग ताला लगाकर निकल गए। किसी तरह से कुछ लोग जो गांव में रुके हुए हैं। वह केवल अपना घर ताकने के लिए रुके हैं।
परिवार के बाकी लोगों को गांव से बाहर भेज दिया गया है। गांव में बने कई मंदिर भी डूब गए हैं। बाढ़ के पानी की स्थिति यह है कि गांव में खड़े वाहन पूरी तरह से डूब गए हैं, तो कहीं आधे से ज्यादा ट्रैक्टर भी डूब गए हैं। 

5 दिन हो गए बिजली नहीं आई है। एक तो गांव के हर घर में पानी भरा हुआ है। ऐसे में जैसे ही शाम को अंधेरा होता है, तो मुसीबत और बढ़ जाती है। पानी में जंगली जानवरों से बच्चों को खतरा बना रहता है। किसी तरह से दिया बाती जलाकर गुजर बसर कर रहे हैं।
यहां तक महिलाएं भी अपना गृहस्थी का सामान लेकर पानी के बीच से निकल रही है, जो लोग रोजाना गांव आ रहे हैं और बाहर जा रहे हैं उन्हें भी नाव नहीं मिल रही है।
गांव में बाढ़ का पानी भर जाने के बाद जो लोग सड़क किनारे आ गए हैं और पॉलिथीन से तंबू बन कर रह रहे हैं ।उनका कहना है कि उन्हें छांव के लिए कोई तिरपाल नहीं दिया गया।
जैसे तैसे फटी पुरानी पॉलिथीन से पेड़ की डाल की लकड़ी से तंबू बनाकर परिवार के साथ रह रहे हैं। साथ में अपने मवेशियों को भी लेकर आए हैं। न ही खुद कहीं ठीक से बैठने की जगह है और ना ही जानवरों को ढंग से चारा खिलाने और बैठने की जगह है।
सड़क के किनारे रह रहे परिवारों के साथ छोटे बच्चे भी हैं। कई बार ऐसा होता है की काफी देर तक उन्हें कुछ खाने को नहीं मिलता तो जैसे ही कोई कुछ भी खाने का सामान बांटने आता है, तो नन्हे बच्चे उनकी तरफ दौड़ पड़ते हैं।
16 से ज्यादा गांवो में पानी भर जाने के कारण वहां गांव वालों के पालतू मवेशी भी उनके साथ ही आ गए हैं। इसलिए वह सब एक ही जगह इकट्ठा हो गए हैं, हालांकि मवेशियों को देखने के लिए गांव के लोग खुद लगे हुए हैं ।गांव से बाहर आने से उनको यहां चारा भी मिल जा रहा है। प्रशासन के द्वारा यहां पर पशु चिकित्सा का कैंप भी लगाया गया है।बारिश होने पर बचने की कोई जगह नहीं है। सड़क के किनारे 150 से अधिक तंबू बनाकर रहने वाले लोगों के हालात यह है कि यदि ऐसे में बारिश होने की स्थिति में भीगने से बचने के लिए कोई संसाधन मौजूद नहीं है। हालांकि जो तंबू लगाए गए हैं, उनसे दिन में धूप से बचने के लिए छांव जरूर मिल जाती है।
कई सालों में इस इलाके की 2000 बीघा फसल खत्म हो गई। इसलिए इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए कि मार्जिनल बांध बनवा दिए जाएं।जिससे बाढ़ आने पर गांव और खेतों में खतरा न हो।