January 16, 2026

संवाददाता
कानपुर। 
देश में डॉल्फिन की कुल आबादी की यूपी में  40 प्रतिशत से ज्यादा पाई जाती है। लेकिन अब कानपुर में 20 साल की फ़ीमेल डॉल्फिन की मौत होने के बाद आने वाली नस्ल पर खतरा मंडरा रहा है। हालांकि अधिकतर डॉल्फिन की मौत की पोस्टमार्टम होने के बाद भी मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो पाता है।
मिर्जापुर में 4 अगस्त, गाजीपुर में 23 दिसंबर, कानपुर में 2 जनवरी और रायबरेली में एक नहर में 8 जनवरी को एक नहर में मृत अवस्था में एक डॉल्फिन मिली थी। यूपी में गंगा, यमुना, चम्बल, घाघरा, राप्ती और गेरुआ जैसी नदियों में डॉल्फिन पाई जाती है।
डॉल्फिन मैन ऑफ इंडिया आर के सिन्हा के मुताबिक कानपुर में गंगा नदी बहुत ही पॉल्यूटेड है, क्योंकि डॉल्फिन साफ जल में रहना पसंद करती है। कानपुर में डॉल्फिन दिखाई दी ये एक बड़ी बात है। मछुआरों के द्वारा प्लास्टिक के जाल लगाए जाते है, जर्जर होने के बाद इनके अवशेष नदी में रह जाते है। इन पर रोक होनी चाहिए।
सबसे पहले डॉल्फिन को असम सरकार ने साल 2007 में राज्य जलीय जीव घोषित किया था। हालांकि अभी तक किसी भी डॉल्फिन की नेचुरल डेथ होना सामने नहीं आया है। डॉल्फिन 10 साल के बाद में प्रजनन करने के लिए तैयार होती है। 
एक मछली एक दिन में 5 से 6 किलो छोटी मछली खाती है। डॉल्फिन नदी में रहने के लिए घुमावदार स्थान, जहां पानी का बहाव कम होता है। या यूं कहें नदी के किनारों पर पाई जाती है, जिससे इसको शिकार करने में ज्यादा परेशानी न हो। साल 2009 में मनमोहन सरकार के द्वारा डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित करवाया था।
कानपुर में मृत अवस्था में मछली मिलना बड़ी बात है, कानपुर में गंगा नदी बहुत ही गंदी है। डॉल्फिन को बचाने के लिए हमको नदियों को साफ करना होगा, नदियों में पानी की पर्याप्त उपलब्धता होनी चाहिए। मछुआरों के द्वारा जो प्लास्टिक का जाल डाला जातय है, ये गलत है।
अगर गंगा में ज्यादा रसायन है तो ये इनके जीवन पर इफेक्ट डालता है। घाघरा, चम्बल, राप्ती, गंगा और यमुना में जो डॉल्फिन पाई जाती है इसको गांगेय डॉल्फिन कहते है।
केंद्र सरकार ने भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया है। इसे स्थानीय स्तर पर ‘जलपरी’ भी कहा जाता है। गंगा नदी में डॉल्फिन की उपस्थिति को ‘मिशन क्लीन गंगा’ की सफलता का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। डॉल्फिन की औसत आयु लगभग 30 वर्ष होती है।
डॉल्फिन को 18 मई 2010 को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया। 
भारतीय वन्यजीव संस्थान ने भारत की नदियों में डॉल्फिन की संख्या जानने के लिए साल–2024 में सर्वे किया। 3 मार्च 2025 को केंद्र सरकार ने इसके आंकड़े जारी किए। गंगा नदी में डॉल्फिन की संख्या 6324 पाई गई। जबकि बिजनौर से नरौरा बैराज तक इनकी संख्या 52 दर्ज की गई।
2023 में ये संख्या 50 थी। यानि बीते एक साल में दो डाल्फिन बढ़ी हैं। साल 2020 से 2024 तक मेरठ और बुलंदशहर जिले में चार डॉल्फिन की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में इनकी मौत का कारण आज तक स्पष्ट नहीं हुआ है।
गंगा में इन जीवों पर संकट की कई वजह दिखाई देती हैं। भारतीय वन्य जीव संस्थान के एक हालिया सर्वे में पता चला है कि गंगेय डॉल्फिन जिन छोटी मछलियों का शिकार करती हैं, वो मछलियां खतरनाक केमिकल के संपर्क में हैं। इस तरह ये केमिकल डॉल्फिन के पेट में पहुंच रहा है। बीते चार साल में मेरठ और बुलंदशहर में चार डॉल्फिन की संदिग्ध हालात में मौत हो चुकी है। आज तक इनकी मौत की सही वजह पता नहीं चल सकी।
इसके अलावा बिजनौर से लेकर मेरठ, बुलंदशहर और आगे तक गंगा के खादर इलाके में जो फसल उगती है, उसमें केमिकल का प्रयोग होता है। ये केमिकल पानी के सहारे बहकर गंगा में पहुंच जाते हैं। इससे भी जलीय जीवों को खतरा रहता है। 

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