
संवाददाता
कानपुर। शहर की धड़कन कही जाने वाली कानपुर मेट्रो ने दक्षिण शहर की पटरियों पर एक नई कामयाबी हासिल की, जिसने भविष्य की रफ्तार की नई इबारत लिख दी है। उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक सुशील कुमार और तमाम बड़े अधिकारियों की मौजूदगी में जब मेट्रो सेंट्रल स्टेशन से रवाना हुई, तो सबकी निगाहें उसके स्पीडोमीटर पर टिकी थीं।
इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि ट्रायल रन के दौरान मेट्रो ने 5 किलोमीटर प्रति घंटे की पारंपरिक लक्ष्मण रेखा को लांघते हुए 10 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ लगाई। यह भले ही सुनने में कम लगे, लेकिन तकनीकी दुनिया में यह एक बड़ी छलांग है, क्योंकि अब तक पहले ट्रायल में कोई भी ट्रेन 5 की स्पीड से ऊपर नहीं ले जाई गई थी।
यूपीएमआरसी के जनसंपर्क विभाग के संयुक्त महाप्रबंधक पंचानन मिश्रा ने बताया कि, एक सुरक्षित सफर के लिए पांच स्तंभों का मजबूत होना अनिवार्य है।
पहली कसौटी है खुद ट्रेन की मजबूती, दूसरी है ट्रैक की सटीकता, तीसरी सिग्नलिंग की समझ, चौथा कंट्रोल रूम से रेडियो सिस्टम का अटूट रिश्ता और पांचवीं सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये ट्रेनें पूरी तरह ऑटोमैटिक हैं।
यानी बिना ड्राइवर के भी क्या यह तकनीक हमें सुरक्षित मंजिल तक पहुंचा पाएगी, इन्ही सवालों के जवाब इस ट्रायल रन में तलाशे गए। सेंट्रल से नौबस्ता तक के इस सफर में हर एक स्टेशन पर रुककर बारीकियों को परखा गया और लोगों से संवाद करके उनके उत्साह को भी महसूस किया गया।
मेट्रो का यह सफर अभी और भी दिलचस्प होने वाला है। स्पीड टेस्ट में पास होने के बाद अब बारी है ‘ताकत’ दिखाने की। आने वाले दिनों में मेट्रो ट्रेन को आम यात्रियों की जगह बालू की बोरियों से खचाखच भरा जाएगा। यह एक तरह का ‘लोड टेस्ट’ होगा, जिसमें यह देखा जाएगा कि जब ट्रेन पूरी क्षमता से भरी होगी, तब उसके पहिए, ट्रैक और बिजली की खपत किस तरह व्यवहार करते हैं।
यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी पहलवान को मैदान में उतारने से पहले उसकी पीठ पर वजन रखकर उसकी मजबूती जांची जाती है। सिविल विभाग के इंजीनियर एक-एक पिलर को चेक करेंगे कि कहीं भारी भरकम ट्रेन के दबाव से कोई दरार तो नहीं आ रही, वहीं ट्रैक डिपार्टमेंट क्लेम्प और पटरियों की सेटिंग को बारीकी से निहारेगा।
यह ट्रायल रन कोई एक-दो दिन का खेल नहीं है, बल्कि अगले दो महीनों तक करीब एक दर्जन विभागों के विशेषज्ञ दिन-रात एक करने वाले हैं। सीसीटीवी कैमरों की नजर से लेकर बिजली के तारों की झंकार तक, हर चीज को ‘परफेक्ट’ होना होगा।
अभी मेट्रो ने ‘अप लाइन’ पर ही अपना जलवा बिखेरा है, और करीब 20 दिनों बाद यही नजारा ‘डाउन लाइन’ पर भी दिखेगा। फरवरी और मार्च का महीना इन तकनीकी बारीकियों के नाम रहेगा, जबकि अप्रैल का महीना अंतरराष्ट्रीय सर्टिफिकेट और रेल मंत्रालय की हरी झंडी मिलने के लिए आरक्षित है।
कानपुर के दक्षिण इलाके में रहने वाली लाखों की आबादी के लिए वह दिन दूर नहीं जब उनका सफर सुहाना और जाम मुक्त होगा। यदि सब कुछ इसी रफ्तार और योजना के मुताबिक चलता रहा, तो मई के पहले हफ्ते में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री इस सौगात का उद्घाटन कर सकते हैं।
सेंट्रल से नौबस्ता के बीच बिछी यह रेल की पटरियां केवल लोहा नहीं हैं, बल्कि कानपुर के विकास की नई धमनियां हैं।






