
संवाददाता
कानपुर। वो भयानक मंजर याद कर दिल दहल जाता है, चारों तरफ कोहराम मचा हुआ था। लोग रो रहे थे, हर तरफ चीखें और एम्बुलेंस के सायरन सुनाई दे रहे थे। यात्रियों की लाशें नदियों में बहती दिख रही थीं। चट्टानों पर सिर कटी हुई लाशें दिख रही थीं। हर कोई अपनों की तलाश में जुटा हुआ था। हम लोग पूरे पांच दिन इस डर से नहीं सो रहे थे कि कहीं बह न जाएं। भरमौर से हलसर तक सिर्फ और सिर्फ तबाही के मंजर दिख रहे थे। तबाही की जानकारी पर घरवालों का रो-रोकर बुरा हाल था।
यह बातें हिमाचल प्रदेश में बादल फटने से हुई तबाही में 13 दिनों तक फंसे कानपुर के मसवनापुर निवासी सुनील कुमार मिश्रा ने घर पहुंचकर कही।
मसवानपुर निवासी खंड शिक्षा कार्यालय में कार्यरत सुनील कुमार मिश्रा 16 अगस्त को मणि महेश सेवा समिति के संरक्षक राकेश शुक्ला और अपने 6 दोस्तों राजीव शर्मा, संतोष कुमार दीक्षित, राजेश तिवारी, राजीव मल्होत्रा, सुरेश राजपूत के साथ हिमाचल प्रदेश स्थित मणि महेश के दर्शन करने के लिए गए थे। 17 अगस्त को वह भरमौर पहुंचे थे, 20 अगस्त को भरमौर से हेलिकॉप्टर के जरिए हलसर पहुंचना था।
खराब मौसम के कारण उड़ान नहीं हो सकी, जिसके बाद वह टैक्सी के जरिए हलसर पहुंचे, जहां से 16 किलोमीटर की लंबी यात्रा करते हुए 21 अगस्त को शिवकुंड पहुंचे, जहां मणि महेश के दर्शन के बाद 22 अगस्त को वापस भरमौर लौटे थे। 23 अगस्त को उन्होंने साथियों के साथ रूद्राभिषेक किया।
25 अगस्त को उनको कानपुर वापस आना था, लेकिन 24 अगस्त की शाम करीब 4 बजे सुंदरासी में बादल फट गया, दिल को लुभाने वाला मंजर पल भर में ही भयावह यादों के रूप में बदल गया।
सुनील ने बताया कि कुछ ही देर में नदियां उफान पर आ गई, जगह–जगह चल रहे लंगर, लोहे के पुल, लॉज बहते नजर आने लगे, पहाड़ों के गिरने से सड़क खत्म हो गईं। कुछ ही देर में भरमौर से हलसर जाने के रास्ते पर एम्बुलेंस दौड़ने लगी, नदियों में लाशों के ढेर दिख रहे थे।
24 से 29 अगस्त तक लगातार मूसलाधार बारिश से जगह–जगह पर पहाड़ गिर रहे थे। खराब मौसम से नेटवर्क ध्वस्त हो गए थे, परिवार वालों से कोई बात नहीं हो रही थी। 30 अगस्त को बारिश हल्की हुई तो हम लोग घर वालों को फोन करने के लिए करीब 18 किलोमीटर पैदल भरमौर से हलसर की ओर गए।
हलसर पहुंचे ही थे, तभी एक चट्टान पर महिला का सिर पड़ा था, जबकि जमीन पर उसका धड़ पड़ा था। आसपास लोगों की लाशें बिखरी पड़ी थी, वह भयावह मंजर देख रुह कांप गई थी। परिजनों को फोन कर उन्हें जानकारी दी, जिसके बाद उनकी जान में जान आई।
इस दौरान सुनील ने हिमाचल सरकार पर सवालिया निशान उठाते हुए कहा कि प्रशासन की ओर से कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। सरकार ने भरमौर को खाली करने के लिए यात्रियों को बसों से 18 किलोमीटर दूर उतार दिया। 50–50 किलोमीटर तक पैदल चल कर लोग भरमौर से चंबा तक पहुंचे।
भरमौर से चंबा तक का रास्ता पूरा बह चुका था, रास्ता पूरा करने में चार-चार दिन लोगों को लगे। इस दौरान स्थानीय लोगों ने यात्रियों की बहुत मदद की। 5 सितंबर को वायुसेना के चिनूक हेलिकॉप्टर भरमौर पहुंचे, तो यात्री जय-जयकार करने लगे।
इसके बाद जान बचने की उम्मीद जागी। करीब 800 यात्रियों को वायुसेना ने रेस्क्यू ऑपरेशन चला कर चंबा पहुंचाया, जहां से बस से वह पठानकोट पहुंचे और पठानकोट से ट्रेन मार्ग के जरिए लखनऊ पहुंचे।
सुनील की बेटी तनु ने बताया कि 24 अगस्त को आखिरी बार पापा से बात हुई थी, तब पिता ने जल्द लौटने को कहा था। अगले दिन कई बार फोन किया, लेकिन फोन नहीं मिला। कुछ देर बाद समाचार चैनलों के जरिए हिमाचल में बादल फटने की जानकारी हुई। घर में डर का माहौल था, रात–रात भर हम लोग सोते नहीं थे। पांच दिन बाद पापा से बात हुई तब जान में जान आई।






