May 15, 2026

संवाददाता 
कानपुर।
  परमट स्थित प्राथमिक स्कूल के बाहर बुधवार को सियासी अखाड़ा बन गया था। बीजेपी और सपा के कार्यकर्ता शिलान्यास कार्यक्रम को लेकर आमने-सामने आ गए थे। 

यह प्राथमिक विद्यालय आजादी के पहले का बना हुआ है। यहां रहने वाले बुजुर्गों ने कहा कि यहां विकास तो हो, लेकिन राजनीति नहीं होनी चाहिए। अगर स्मार्ट क्लास और स्कूल में बेहतर सुविधाएं मिल जाएंगी तो स्थानीय बच्चों को एक अच्छा स्कूल मिल जाएगा।
परमट कानपुर शहर का पुराना मोहल्ला है, जहां यह पुराना प्राथमिक विद्यालय बना हुआ है। यहां अंग्रेजों के समय में भी स्कूल हुआ करता था। जिन बुजुर्गों ने यहां शिक्षा हासिल की, उनके पिता ने भी यहीं से शिक्षा हासिल की थी। 

यहां के निवासी नगर निगम से रिटायर्ड 74 वर्षीय एम.एस. शर्मा ने बताया कि उनके पिता बताते थे कि इस जगह का नाम परमट इसलिए पड़ा क्योंकि शहर की मिलों में बनने वाला कपड़ा नाव और जहाज से गंगा के रास्ते भेजा जाता था। परमट चौराहे के आगे, जहां अब ग्रीनपार्क मैदान का गेट है, वहां नाव का परमिट बनता था। इसी वजह से इस जगह का नाम बाद में परमट हो गया। परमिट बनने वाले स्थान को लोग धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र के नाम से जानने लगे।

शर्मा ने बताया कि वह इस प्राइमरी स्कूल में कक्षा 5 तक पढ़े हैं। यहां से शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने डीएवी इंटर और डीएवी डिग्री कॉलेज में पढ़ाई की। उन्होंने नगर निगम में नौकरी की और अब रिटायर्ड हो चुके हैं। उनका कहना है कि स्कूल को लेकर जो भी हुआ, वह ठीक नहीं है। स्कूल है तो यहां केवल शिक्षा की बात होनी चाहिए, राजनीति नहीं होनी चाहिए।
स्थानीय ओम प्रकाश शुक्ला ने बताया कि उनकी उम्र 70 साल हो गई है। वह खुद इसी स्कूल में पढ़े हैं। जब से पैदा हुए और बड़े हुए, तब से यह स्कूल यहां है। उस हिसाब से यह स्कूल करीब 100 साल पुराना है। दो बार यह स्कूल टूटकर दोबारा बन चुका है। कुछ दिनों से यहां तोड़-फोड़ का कार्य किया जा रहा था। अभी भी बच्चे यहां पढ़ने आते हैं। सुना है कि यहां स्मार्ट क्लास बनने जा रही है, यह अच्छी बात है, लेकिन इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
रवींद्र कुमार शुक्ला, जो परमट से पूर्व पार्षद प्रत्याशी रह चुके हैं, उनकी उम्र करीब 74 साल है। उनका कहना है कि वह भी इसी स्कूल में पढ़े हैं। कई क्षेत्रीय लोग इसी स्कूल में पढ़े, जो आज उच्च पदों पर हैं। उनकी यादें इस स्कूल से जुड़ी हैं। अंग्रेजों के समय में भी यहां स्कूल था। बाद में आजादी के बाद यहां सरकार ने प्राथमिक विद्यालय बनवा दिया।
उन्होंने बताया कि जब वह यहां कक्षा 1 में पढ़ते थे, तब स्कूल के प्रधानाचार्य रामभरोसे तिवारी थे। खास बात यह है कि उनके पिता भी इसी स्कूल में पढ़ते थे और उनके समय में भी रामभरोसे तिवारी शिक्षक हुआ करते थे। इस स्कूल से उनकी यादें जुड़ी हैं। उनका कहना है कि जो भी इस स्कूल का विकास करा रहा है, वह उसके साथ हैं। 

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