
संवाददाता
कानपुर। फर्जी डिग्री और मार्कशीट बनाने वालों तक पहुंचने के लिए एक इंस्पेक्टर को मार्कशीट बनवानी पड़ी। हाईस्कूल की मार्कशीट बनवाने के लिए वह सरगना के शैलेंद्र के शैल ग्रुप ऑफ एजुकेशन कार्यालय पहुंचे। इंस्पेक्टर ने सरगना से कहा कि मुझे सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करनी है। इसके लिए हाईस्कूल की मार्कशीट बनवानी है।
शैलेंद्र ने कहा कि 21 हजार रुपए में मार्कशीट मिल जाएगी। इंस्पेक्टर ने 16 हजार रुपए एडवांस दिए। 15 दिन बाद शैलेंद्र ने इंस्पेक्टर को बुलाया। इंस्पेक्टर शैलेंद्र के आफिस पहुंचे। जहां शैलेंद्र ने इंस्पेक्टर को जामिया ऊर्दू अलीगढ़ की हाईस्कूल की मार्कशीट दी।
तभी पुलिस ने उसे अरेस्ट कर लिया। इसके बाद पुलिस ने उसके तीन और साथियों को पकड़ लिया। पुलिस जांच में पता चला कि शैलेंद्र के विश्वविद्यालयों के बाबूओं और कर्मचारियों से अच्छे संबंध हैं। वह बाबुओं को महंगे गिफ्ट देता था। पार्टियों का भी आयोजन कराता था।
पुलिस ने गुरुवार को नकली डिग्री बनाने बनाने वाले 4 आरोपियों को अरेस्ट किया था। आरोपियों के पास से छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय समेत 14 विश्वविद्यालय की 900 फर्जी डिग्रियां, मार्कशीट समेत अन्य दस्तावेज बरामद हुए थे।
कानपुर पुलिस ने करीब 2 महीने पहले फर्जी लॉ की डिग्री हासिल करने वाले दीनू उपाध्याय और आशीष शुक्ला को गिरफ्तार करके जेल भेजा था। इसके बाद गिरोह तक पहुंचने के लिए पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने एक प्लान बनाया। 20 दिन पहले कमिश्नर ने इस नेक्सस को तोड़ने की जिम्मेदारी एक इंस्पेक्टर को दी। उन्होंने इंस्पेक्टर को अपने आफिस बुलाया और कहा- तुम्हारे लिए टास्क है। टास्क ये है कि तुम्हें फर्जी डिग्री बनाने वाले लोगों को पकड़ना है। उन्होंने कहा कि ये बात किसी भी पुलिस कर्मी और थाने को पता नहीं चलनी चाहिए। ये काम तुम्हें सीक्रेट तरीके से करना है।
इंस्पेक्टर ने हामी भर दी। 15 दिनों में इंस्पेक्टर ने नकली डिग्री बनाने वालों को सर्च कर लिया। मगर दिक्कत ये थी कि बगैर साक्ष्य के आरोपियों को कैसे पकड़ा जाए? इसी बीच इंस्पेक्टर को एक आइडिया आया। उसने सोचा कि वह सरगना से ग्राहक बनकर मिलेगा।
इसके बाद इंस्पेक्टर एक साधारण ग्रामीण का भेष धारण कर सरगना मैथ टीचर शैलेंद्र के आफिस पहुंचे। इंस्पेक्टर ने शैलेन्द्र से कहा कि मुझे हाईस्कूल की मार्कशीट की जरूरत है। शैलेंद्र ने कहा कि इस उम्र में मार्कशीट की क्या जरूरत है? इंस्पेक्टर ने कहा कि मुझे एक कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करनी है। उसके लिए हाईस्कूल की मार्कशीट मांगी जा रही है। मगर मेरे पास मार्कशीट नहीं है। अब हाईस्कूल की उम्र निकल चुकी है।
अब तो हाईस्कूल भी नहीं कर सकता। इस पर शैलेंद्र ने प्राइवेट फार्म भरने की बात कही और पेपर देने के लिए कहा। इंस्पेक्टर ने कहा कि इसमें तो एक साल लग जाएगा। तब तक तो नौकरी भी चली जाएगी। कुछ जुगाड़ करके मार्कशीट दिलवा दीजिए।
शैलेंद्र ने इंस्पेक्टर से कहा कि एक रास्ता है, मगर पैसे देने पड़ेंगे। इंस्पेक्टर ने हामी भर दी। शैलेंद्र ने कहा कि 21 हजार रुपए लगेंगे। मैं तुम्हें 20 दिन के अंदर हाईस्कूल की मार्कशीट का जुगाड़ करवाकर दे दूंगा।
इंस्पेक्टर ने कहा कि पैसे ज्यादा हैं, कुछ कम कर दीजिए। शैलेंद्र बोला- इससे कम नहीं हो सकता, ऊपर तक पैसे पहुंचाने पड़ते हैं। इंस्पेक्टर ने हामी भरी तो 21 हजार में सौदा तय हुआ। शैलेंद्र ने एडवांस जमा करने को कहा।
इंस्पेक्टर ने 16 हजार रुपए एडवांस में दे दिए। 15 दिन बाद इंस्पेक्टर के मोबाइल पर वाट्सएप मैसेज आया। ये मैसेज शैलेंद्र का था। लिखा था- आपका काम हो गया है। ऑफिस आ जाइए। इंस्पेक्टर ने यह बात पुलिस कमिश्नर को बताई। इसके बाद किदवई नगर पुलिस को अलर्ट किया गया। पुलिस भी शैलेंद्र के साथ गई।
इंस्पेक्टर शैलेंद्र के शैल ग्रुप ऑफ एजुकेशन कार्यालय पहुंचे। यहां उन्हें शैलेंद्र ने जामिया ऊर्दू अलीगढ़ की हाईस्कूल की मार्कशीट थमा दी। इसी दौरान पुलिस ने शैलेंद्र को धर दबोचा।
पुलिस के मुताबिक गैंग से जुड़े रनियां निवासी दिलीप बाबू का नाम सामने आया है। दिलीप के पास फेल होने वाले स्टूडेंट्स का डाटा आ जाता था। इस पर ये लोग खुद ही छात्रों से संपर्क करते थे और बिना एग्जाम दिए पास की मार्कशीट दिलाने का वादा कर मोटी रकम वसूलते थे।
गिरोह के दिए सर्टिफिकेट और मार्कशीट निजी नौकरी व अन्य कार्यों के लिए प्रयोग किए जाते हैं। दस्तावेज ऑनलाइन चेक कराने के बाद ही गिरोह मार्कशीट, प्रमाणपत्र देता था। अधिकारियों ने बताया कि इनके पास डी-फार्मा, बी-फार्मा और बीटेक समेत तमाम प्रोफेशनल कोर्सेज की डिग्री लेने वाले लोग अधिकतर आते थे।
डीसीपी साउथ दीपेंद्र नाथ चौधरी ने बताया कि अभी गैंग से जुड़े 5 आरोपियों की तलाश की जा रही है। यह बहुत ही संगीन मामला है, जिसमें तमाम यूनिवर्सिटी के बाबू और कर्मचारी भी संलिप्त हैं, यह लोग किस तरह से प्रपत्रों में हेरफेर करते थे, जिससे मार्कशीट ऑनलाइन अपलोड हो जाती थी।इस सब तथ्यों के लिए एसआईटी का गठन किया गया है। टीमें हर यूनिवर्सिटी मूल प्रपत्रों की जांच करने पहुंचेगी, जिसके बाद कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस कमिश्नर के मुताबिक गिरोह से जुड़े छतरपुर निवासी मयंक भारद्वाज, हैदराबाद निवासी मनीष उर्फ रवि, गाजियाबाद निवासी विनीत, भोपाल निवासी शेखू व शुभम दुबे फरार चल रहे है। उनकी तलाश में पुलिस की तीन टीमें लगी हुई हैं।
आरोपियों के पास से विभिन्न विश्वविद्यालयों की फर्जी मार्कशीट, डिग्रियां, ग्रेड शीट, प्रोविजनल सर्टिफिकेट, माइग्रेशन बुकलेट व छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय की डिप्टी रजिस्ट्रार की नकली मोहर बरामद की गई है। आरोपियों ने लगभग 80 फर्जी माइग्रेशन सर्टिफिकेट जारी करने की बात भी कबूल की है।






