February 7, 2026

संवाददाता
कानपुर।
  कोडीन युक्त कफ सीरप और नशीली दवाओं को बेचने वाला आरोपी विनोद अग्रवाल मात्र 6 सालों में अरबपति बन गया था। उसने कानपुर के सिविल लाइंस में करीब 10 करोड़ का एक प्लॉट, पटकापुर में फ्लैट, बिरहाना रोड में करोड़ों का एक मकान खरीदा था।
हरियाणा से गिरफ्तारी के बाद यहां उसने पुलिस की पूछताछ में बताया कि 2019 में अग्रवाल ब्रदर्स के नाम से जेनरिक और शेड्यूल एच ड्रग्स (नशीली दवाओं) का लाइसेंस लिया, इसके बाद वह कानपुर में नशीली दवाओं का सबसे बड़ा सुपर स्टॉकिस्ट और डिस्ट्रीब्यूटर बन बैठा। लाइसेंस मिलने के बाद विनोद ने फुटकर दवाओं की बिक्री पूरी तरह से बंद करके बड़े-बडे़ ऑर्डर लेने लगा।
इसके बाद वह हिमाचल से दवाओं का स्टॉक मंगवाता और पूरे यूपी के साथ बिहार, झारखंड, वेस्ट बंगाल, आसाम में नशीली दवाओं का कारोबार करता था। इसके साथ ही नेपाल और बांग्लादेश में नशीली दवाओं को डायवर्ट करने के लिंक सामने आए हैं।
मामले की जांच के लिए गठित की गई एसआईटी को लीड कर रहीं एडीसीपी क्राइम अंजलि विश्वकर्मा ने बताया कि विनोद ने एक के बाद एक कई अलग-अलग फर्में तैयार की। जांच में विनोद के नाम एक, उसके बेटे शिवम अग्रवाल के नाम पर 2 फर्म और उसकी भाभी के नाम एक फर्म मिली।
इसके साथ ही दो और फर्म मिली, जिनके विनोद और उसके बेटे के अकाउंट में राउंड ट्रिपिंग (भ्रामक वित्तीय प्रक्रिया) मिली है, हालांकि विनोद का कहना है कि उन फर्मों से उसका कोई वास्ता नहीं है। जांच में सामने आया कि विनोद की फर्म से सालाना 6 से 7 करोड़ का कारोबार होता था।
कुछ समय बाद उसने अपने बेटे शिवम को डिस्ट्रीब्यूटर शिप दिलाई और उसकी एक फर्म से एक साल में 15 करोड़ का कारोबार किया गया। मुनाफा होने के बावजूद एक साल बाद फर्म अचानक बंद कर दी गई। आखिर क्या वजह रही कि फर्म अचानक बंद हो गई ? इन सब तथ्यों की जानकारी शिवम की गिरफ्तारी के बाद ही हो सकेगी।
शिवम की दूसरी फर्म का जीएसटी डिपार्टमेंट से डाटा जुटाया जा रहा है। पुलिस की जांच में सामने आया कि विनोद अपनी फर्म से 50 से 60 लाख रुपए प्रतिमाह की सेल करता था, जिसमें से 25 प्रतिशत फंड का पुलिस को अब तक सोर्स नहीं मिला है। इस रकम को अलग-अलग फर्माें के जरिए घुमाया गया है।
जांच में सामने आया कि जिन कंपनियों को विनोद ने दवाइयां सप्लाई की उनसे व्यापारिक लेनदेन में कई घालमेल मिला है। जैसे कि कुछ फर्मों से विनोद के खातों में एडवांस रुपए दिए गए, जबकि कई फर्मों से सप्लाई किए माल की आधी रकम तक नहीं मिली, जो कि शेड्यूल एच ड्रग्स की सप्लाई करने में संभव नहीं है।
मामले में एडीसीपी क्राइम ब्रांच अंजलि विश्वकर्मा ने बताया कि मानकों के मुताबिक शेड्यूल एच ड्रग्स की सप्लाई के लिए फंडिंग सही होना बहुत जरूरी है। अब सवाल यह उठता है कि उन कंपनियों को नशीली दवाएं क्यों सप्लाई की जा रही थीं, जिनकी फंडिंग सही नहीं है। इस तरह के कई बड़े हेर-फेर विनोद के फाइनेंशियल एनालिसिस में मिले हैं।
एडीसीपी ने बताया कि कंपनियों की बेतरतीब फंडिंग के बारे में विनोद से पूछताछ की गई, तो उसने बताया कि कुछ कंपनियों ने उसे एडवांस पैसा दिया था, लेकिन इसका वह ब्योरा नहीं दे पाया है। उन्होंने बताया कि नशीली दवाओं की बिक्री के लिए जीएसटी बिल काटा जाता है और हर महीने रिटर्न दाखिल करना होता है।
क्योंकि विनोद अग्रवाल ड्रिस्ट्रीब्यूटर हैं, जिनकी अधिकांश सप्लाई कानपुर से बाहर जाती है, इसके लिए ई–वे बिल जारी होता है। जो कि शेड्यूल एच ड्रग्स की सप्लाई करने के लिए संभव नहीं है। जांच में कई दवाओं का जीएसटी बिल व कई का ई-वे बिल जारी नही किया गया था।
विनोद की फाइनेंशियल एनालिसिस में लगी टीम के अधिकारी के मुताबिक विनोद, उसके बेटे की फर्मों के जरिए करोड़ों का हेरफेर किया गया है। सामने आया कि एक फर्म से दवा की बिक्री की जा रही थी, जबकि पेमेंट दूसरी फर्म में किया जा रहा था।
इतना ही नहीं इसके बाद अपनी एक और फर्म से खुद को लोन धारक दर्शाया गया है, जिससे उन पैसों का सेटलमेंट किया जा सके, जो कि अकाउंटेंट के जरिए पैसों को मैनेज करने की कोशिश है। पुलिस टीम ने बताया कि अभी आरोपी के खातों का 2 साल का डाटा एनालिसिस किया जा रहा है, जिसमें करोड़ों का हेरफेर सामने आया है।
मुकदमा दर्ज होने के बाद आरोपी ने बताया कि उसकी 47 कंपनियों को दवाइयां बेचता था, जिसमें कुछ कंपनियों ने माल खरीदने का सत्यापन किया, लेकिन करीब 20 फर्मों ने दवाइयां खरीदने से मना कर दिया। पुलिस ने जीएसटी डाटा निकाला तो सामने आया कि विनोद ने 333 कंपनियों को दवाइयां सप्लाई की थी।
अब पुलिस ये जांच कर रही है कि कितनी दवाइयां शेड्यूल एच ड्रग्स हैं और कितनी जेनरिक, इसकी जांच की जा रही है। विनोद की फर्म के साथ काम करने वाली कंपनियों के बिल्स और स्टॉक रजिस्टर मंगाए जा रहे हैं।
एडीसीपी ने बताया कि विनोद और शिवम के नाम से विभिन्न बैंकों में खुले खातों की जांच में करोड़ों का ट्रांजेक्शन मिला है। हालांकि मुकदमा दर्ज होने के बाद आरोपियों ने खातों से पैसा निकाल लिया था, करीब 35 लाख रुपया 8 से 10 खातों में मिला, जिन्हें फ्रीज करा दिया गया है।
जांच में सामने आया कि विनोद ने एक बैंक से करीब 1.5 से 2 करोड़ की सीसी लिमिट करा रखी थी, इसके साथ ही मकान के नाम पर 3 करोड़ का लोन लिया था। जल्द ही आरोपी की पुलिस कस्टडी रिमांड लेकर जांच कर पूछताछ की जाएगी।
औषधि लाइसेंस की आड़ में एनडीपीएस श्रेणी से संबंधित कोडीन युक्त सीरप व नशीली दवाएं खरीदने और बेचने वाली फर्मों के खिलाफ औषधि निरीक्षक ने दो माह के भीतर कलक्टरगंज थाने में चार, रायपुरवा, कल्याणपुर, हनुमंत विहार थाने में एक-एक मुकदमे कराए थे।
इसमें अग्रवाल ब्रदर्स के संचालक फीलखाना के पटकापुर के विनोद अग्रवाल, उनका बेटा शिवम अग्रवाल, अनमोल गुप्ता, मंजू शर्मा, अभिषेक शर्मा व वेद प्रकाश शिवहरे, सुमित केसरवानी समेत आरोपी हैं, पूरे प्रकरण की जांच एसआईटी कर रही है। हालांकि पहले थानों से भी विवेचना की जा रही थी, जो एक सप्ताह पहले क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई।
पुलिस की जांच में पता चला कि आरोपियों ने उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, असम, मिजोरम राज्यों के जिलों में 200 से अधिक फर्मे बनाकर लगभग 20 लाख शीशियां कोडीन युक्त सीरप व नशीली दवाओं की बिक्री होना दिखाया था। आरोपी विनोद अग्रवाल के खिलाफ 50 हजार का इनाम घोषित था।
विनोद अग्रवाल पर औषधियों के अवैध क्रय-विक्रय व भंडारण करने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माल अवैध औषधियों के भेजने और कूटरचित दस्तावेज बनाने का आरोप है। उसे साइबर टीम की मदद से के हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के नारनौल के दादू की कोठी आजाद चाैक से गिरफ्तार किया गया था। उसके बेटे समेत अन्य आरोपियों की तलाश में टीम लगी है। 

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