
संवाददाता
कानपुर। नगर का ‘हटिया बाजार’ इन दिनों पूरी तरह रंगों के खुमार में डूबा हुआ है। लगभग एक सदी से भी ज्यादा पुराना यह बाजार आज भी अपनी पुरानी रौनक और परंपरा को समेटे हुए है। यहां पीढ़ियों से रंगों का कारोबार होता आ रहा है।
यहां की तंग गलियों में उड़ता गुलाल और सजी हुई दुकानें न केवल शहर, बल्कि आसपास के कई जिलों की होली की रंगत तय करती हैं। हटिया का यह बाजार आज भी अपनी साख और शुद्धता के लिए मशहूर है।
कारोबारी अरुण बताते हैं कि बाजार का नाम ‘हाट’ शब्द से पड़ा है। समय के साथ ये ‘हटिया’ बन गया। उनके पिता और बाबा के समय से यहां रंगों का काम होता आ रहा है। यह बाजार 100 साल से भी अधिक पुराना है।
आज भी यहां व्यापार करने का तरीका वही पुराना और भरोसेमंद है, यही वजह है कि यहां केवल कानपुर ही नहीं बल्कि उन्नाव, हमीरपुर और बिहार तक से थोक और फुटकर ग्राहक खिंचे चले आते हैं।
हटिया बाजार में रंगों की विविधता देखते ही बनती है। यहां के कारोबारी बताते हैं,कि पक्के रंगों को खास तौर पर गुजरात जैसे बाहरी राज्यों से मंगाया जाता है, लेकिन अबीर और गुलाल का निर्माण स्थानीय स्तर पर ही किया जाता है।
यहां तैयार होने वाले हर्बल गुलाल की मांग सबसे ज्यादा है। इसे बनाने के लिए शुद्ध आरारोट और उसमें खाने वाले रंगों को मिलाया जाता है, ताकि लोगों की त्वचा को कोई नुकसान न पहुंचे। बाजार में लाल, हरा, गुलाबी, पीला और नारंगी के साथ-साथ भगवा रंग की जबरदस्त डिमांड देखी जा रही है।






