
आ स. संवाददाता
कानपुर। नरवल में स्थित मां रावल देवी का मंदिर लगभग 500 वर्ष पुराना है। यह मंदिर नरवल गांव की कुलदेवी का है। नवरात्रि के दौरान यहां भक्तों की विशेष भीड़ उमड़ रही है। मंदिर के पुजारी पदम प्रकाश पांडेय के अनुसार, मां रावल देवी एक सिद्ध देवी हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि जो भी भक्त सच्चे मन से मन्नत मांगता है, माता उसकी मनोकामना अवश्य पूरी करती हैं।
मंदिर का इतिहास बेहद रोचक है। सैकड़ों वर्ष पहले यहां एक छोटी सी मठिया थी, जिसमें माता की मूर्ति स्थापित थी। मंदिर के पास एक प्राचीन तालाब भी मौजूद है। नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस पूजा से भक्तों के सभी रोग और कष्ट दूर हो जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों तक पूरा क्षेत्र भक्तिमय माहौल में रहता है।
एक खास परंपरा के अनुसार, जिन भक्तों की मनोकामना पूरी होती है, वे नवरात्रि की दशमी को मंदिर में दर्शन करने के बाद जवारा जुलूस निकालते हैं।
ठीक इसी तरह से नरवल में स्थित प्राचीन मां काली मंदिर की मान्यता बेहद खास है। यह मंदिर सैकड़ों वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। नवरात्रि के पावन अवसर पर यहां विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है।स्थानीय निवासी अनुज साहू के अनुसार, मंदिर का इतिहास पौराणिक काल से जुड़ा है। पहले यहां एक छोटी मठिया थी, जिसमें मां काली की मूर्ति स्थापित थी। मुगल काल में मूर्ति खंडित कर दी गई थी। वर्ष 2002 में ग्रामीणों के सहयोग से विधि-विधान से नई मूर्ति की स्थापना की गई।
मंदिर की सेविका रानी सैनी, चमेली सैनी और रेखा सैनी बताती हैं कि वे कई वर्षों से माता की सेवा कर रही हैं। मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की हर मनोकामना पूरी होती है। नवरात्रि में विशेष हवन का आयोजन किया जाता है।
मंदिर में एक विशेष मान्यता है कि जो भक्त मां के सामने अपना दुख-दर्द रोकर बताता है, उसकी सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं। ऊपरी बाधा से पीड़ित लोगों को मां के दर्शन मात्र से राहत मिलती है। नवरात्रि में यहां मुंडन और छेदन जैसे संस्कार भी होते हैं। मार्ग से गुजरने वाले श्रद्धालु मां के चरणों में शीश झुकाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।