
संवाददाता
कानपुर। कड़कड़ाती ठंड की विदाई और बसंत के स्वागत के साथ ही प्रकृति मानो नए रंगों में सज गई है। फिज़ाओं में घुलती हल्की गुलाबी ठंडक, दोपहर की नरम धूप और शाम की सुहानी बयार यह साफ संकेत दे रही है कि फाल्गुन अपने पूरे शबाब पर रंग बिखेर रहा है। खेतों से लेकर शहर की गलियों तक, गांव की चौपालों से लेकर बाजारों की चहल-पहल तक—हर ओर फाल्गुनी रंग बिखर चुका है और त्योहारों का उल्लास अपने चरम पर पहुंचता दिख रहा है।
फाल्गुन का नाम लेते ही सबसे पहले होली की आहट सुनाई देने लगती है। बसंत पंचमी के बाद से ही खेतों में सरसों के पीले फूल लहराने लगते हैं, जो धरती को मानो सुनहरे वस्त्र पहनाते हैं। आम के बौर, पलाश के लाल फूल और पेड़ों पर फूटती नई कोपलें मौसम के बदलाव का जीवंत प्रमाण बन जाती हैं। किसान अच्छी फसल की उम्मीद में प्रसन्न दिखाई देते हैं, वहीं ग्रामीण अंचलों में लोकगीतों और परंपराओं की गूंज तेज हो जाती है।
मौसम के लिहाज से फाल्गुन को सबसे सुहावना महीना माना जाता है। न अधिक सर्दी, न तीखी गर्मी—बस संतुलित और मनभावन वातावरण। यही वजह है कि लोग घरों से निकलकर खुले मैदानों, पार्कों और सैरगाहों की ओर खिंचे चले आ रहे हैं। सुबह की सैर हो या शाम की टहल, हर किसी के चेहरे पर मौसम की ताजगी और त्योहार की उमंग साफ झलक रही है।
शाम ढलते ही शहर की सड़कों पर रौनक बढ़ जाती है। बाजारों में गुलाल, अबीर, पिचकारी, रंग-बिरंगे मुखौटे और होली की पारंपरिक मिठाइयों से सजी दुकानें त्योहार के आगमन का ऐलान खुद-ब-खुद कर देती हैं। बच्चों की खिलखिलाहट, युवाओं की खरीदारी और बुजुर्गों की ठंडी धूप में बैठी बातचीत—सब मिलकर फाल्गुन को जीवंत बना देते हैं।
धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी फाल्गुन का विशेष महत्व है। महाशिवरात्रि, फाल्गुनी मेलों और लोकपर्वों का आयोजन जगह-जगह किया जा रहा है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और सत्संग का दौर चल रहा है। श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ और भक्ति का माहौल इस मौसम को और भी खास बना देता है। कई क्षेत्रों में लोकनृत्य, नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए परंपराओं को जीवित रखा जा रहा है।
व्यापार और बाजार भी फाल्गुनी रंग में पूरी तरह रंगे नजर आ रहे हैं। मिठाई की दुकानों पर गुझिया, ठंडाई, मालपुआ और अन्य पारंपरिक व्यंजन सज चुके हैं। कपड़ों की दुकानों पर सफेद कुर्ता-पायजामा, रंगीन दुपट्टे और होली स्पेशल परिधानों की मांग बढ़ गई है। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े व्यापारियों तक, सभी को इस मौसम से अच्छी बिक्री और कारोबार में तेजी की उम्मीद है।
फाल्गुन केवल मौसम का नाम नहीं, बल्कि यह खुशियों, मेल-मिलाप और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक भी है। यह वह समय है जब लोग आपसी मतभेद भुलाकर एक-दूसरे के करीब आते हैं, रंगों के जरिए रिश्तों में नई ताजगी भरते हैं। संगीत, परंपरा और उल्लास का यह संगम जिंदगी को नए रंगों से भर देता है।
कुल मिलाकर, मौसम में चढ़ा फाल्गुनी रंग अब हर दिल पर छा चुका है। प्रकृति, बाजार, धार्मिक स्थल और आम जनजीवन—सब एक ही लय में त्योहारों का स्वागत करते नजर आ रहे हैं। यह फाल्गुन न केवल मौसम का बदलाव है, बल्कि समाज को जोड़ने वाला वह रंगीन उत्सव भी है, जो हर साल खुशियों की नई उम्मीद लेकर आता है।






