
संवाददाता
कानपुर। यूक्रेन और रशिया के युद्ध में देखा जाए तो सबसे ज्यादा अटैक ड्रोन के माध्यम से किए जा रहे हैं। पहले के समय में मिसाइल और गोलियों का प्रयोग किया जाता था, लेकिन बदलते समय में युद्ध का तरीका भी बदलता जा रहा है। यही कारण है कि अब सेना को ड्रोन की ताकत का एहसास हुआ है और ऑपरेशन सिंदूर में भी ड्रोन का काफी प्रयोग किया गया था।
आईआईटी कानपुर के ड्रोन का प्रयोग सेना अपने अलग-अलग ऑपरेशन में कर रही हैं। इसके अलावा सेना ने संस्थान से कुछ अपेक्षाएं भी जाहिर की हैं। आने वाले समय में संस्थान सेना के लिए वैसे ही ड्रोन तैयार करेगी।
एयरो स्पेश इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. अभिषेक ने बताया कि इस समय हम लोग स्टार्टअप के साथ मिलकर ढ़ाई सौ ग्राम से लेकर डेढ़ किलो तक के ड्रोन तैयार कर रहे हैं। ये ड्रोन सेना के लिए काफी सहायक साबित हुए हैं।
हाई विजिबिलिटी कैमरे, नई टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर नैनो ड्रोन (एफपीपी) तैयार किए हैं। करीब 30 से 40 प्रकार के ड्रोन सेनाओं को अभी तक उपलब्ध हो चुके हैं। कुछ में अभी काम चल रहा हैं।
प्रो. अभिषेक बताते है कि सेना में दो प्रकार के ड्रोन की मांग अधिक है। पहला ड्रोन जो सर्विलांस कर के वापस आ जाए। दूसरा वो जो अटैक ड्रोन होता है। जिसे कामीकाजे ड्रोन भी कहते हैं। कामीकाजे ड्रोन सबसे अच्छा और सबसे बेहतर साबित हुआ है। इसकी लागत भी अन्य ड्रोन के मुकाबले कम होती हैं।
कामीकाजे एक जापानी भाषा का शब्द है। इसका मतलब होता है सुसाइड ड्रोन। ये ड्रोन 250 ग्राम भार का होता है। ये हवा में 30 मिनट से लेकर 1 घंटे तक उड़ सकता हैं। इसकी लागत करीब 1 लाख से 1.5 लाख तक आती हैं।
इसकी खासियत ये होती है कि ये ड्रोन टारगेट पर ही अटैक करता है। इसमें हाई विजिबिलिटी वाला कैमरा लगा होता है। उसको जूम करके हम दुश्मनों के ठिकानों को आसानी से देख सकते हैं। ये दुश्मनों के ठिकानों पर 4 से 5 किलो मीटर अंदर तक जा सकता है।
प्रो. अभिषेक बताते है कि सर्विलांस ड्रोन दुश्मनों के ठिकानों में लगभग 10 किलो मीटर अंदर तक जाकर वहां कि सारी गतिविधियों को नोट करके ले आएगा। इसकी खासियत ये है कि ये पेड़ के अंदर तक की चीजों को बता सकता है।
अगर घना जंगल है तो ये बता देगा कि यहां पर क्या हो रहा है। किस तरह की गतिविधियां अंदर हो रहीं है। बस आदमी को ये नहीं दिखता हैं, बाकि जितनी मेटल से संबंधित चीजें होगी उनकी सटीक जानकारी लेकर वापस अपनी सीमा पर आ जाएगा। इस ड्रोन की लागत लगभग 50 लाख रुपए तक आती हैं।
प्रो. अभिषेक ने बताया कि सबल-20 ड्रोन ईस्टर्न कमांड को दिए गए हैं। ये ड्रोन लगभग 20 किलो का है और ये अपने साथ 20 किलो तक का वजन भी उठा सकता हैं। इस ड्रोन का प्रयोग सियाचिन जैसी जगहों पर भी किया जा सकता है।
जहां बड़ी-बड़ी पहाड़ी हो, तेज हवा हो वहां भी ये ड्रोन काम करता है। इसमें आप 20 किलो तक कोई भी सामान या फिर बम फिट करके इसे 15000 फिट की ऊंचाई में उड़ा सकते हैं।
उन्होंने बताया कि अलख ड्रोन की भी सप्लाई अलग-अलग कर चुके हैं। अभी तक लगभग 40 ड्रोन सप्लाई किए हैं। उत्तरकाशी में टनल धसी थी तो कोई भी वहां तक जाने की स्थिति में नहीं था।
एक अलख ड्रोन ऐसा था जिसको टनल तक भेजा गया और वहां पर पूरी स्थिति को देखा गया था। इसी ड्रोन के माध्यम से पता चला था कि टनल में जाने का अब कोई भी रास्ता नहीं बचा हैं।
ये ड्रोन 5 किलो मीटर तक जा सकता है। अगर कही भी खुफिया जानकारी लानी हो तो भी इसका प्रयोग हम कर सकते हैं। इसमें जिस तरह के कैमरे और टेक्नोलॉजी का प्रयोग करेंगे उतना ही ये महंगा होता जाएगा। ये ड्रोन 1.5 लाख से 5 लाख रुपए तक तैयार होता हैं।
प्रो. अभिषेक ने बताया कि इन सभी ड्रोन में हम लोग अपनी खुद की पेटेंट टेक्नोलॉजी का कर प्रयोग कर रहे हैं, जो भी ड्रोन तैयार किए जा रहे है ये अन्य देशों के ड्रोन के मुकाबले काफी अच्छे है। संस्थान में जब कोई सेना के अधिकारी आते है तो हम लोग उनकी आवश्यकताओ को समझते है और प्रयास करते है कि इसी आधार पर काम करें और एक शक्तिशाली ड्रोन तैयार करें।






