
फागुन फूला वन-उपवन, उर उमंग उछाल,
राधा-श्याम रचें रस-रास, उड़े अबीर गुलाल।
काशी में शिव शंभु हँसे, भस्म-रंग रस-धार,
डमरू-ध्वनि दिग-दिग गूँजे, झूमे सकल संसार।
हमने भी रंग डाला जी, मिट गई उदासी,
नील-हरित-पीत अरु लाल, हँसी लिये बनवासी।
दोस्तों संग टोली चलती, ठिठोली की चाल,
पिचकारी की फुहार से, भीगे गाल-विहाल।
है अनुपम अभिराम रंग, अनुराग अंबर-ताल,
मन-मयूर नाचे मगन, प्रेम-पिचकारी लाल।
छटा-छबीली चारु छवि, सुषमा-सुंदर गात,
होली हर ले मन-विषाद, भर दे हर्ष प्रभात॥
फाग फुहार फुलवारी में, पुलकित पात-पलाश,
रास रंग रंगीला रचें, राधा-श्याम विलास।
शिव शशिधर शीतल छवि, काशी करे कमाल,
भांग-भभूत-भास्वर भाल, बरसे हर्ष-उछाल।
हँसी-हुलास हिलोर ले, हृदय हुआ निहाल,
संग-साथ सौहार्द से सजे, स्नेहिल हर चौपाल।
मिलन-मधुरिमा महके, मिटे मनोमल-काल,
प्रीत-पिचकारी पावन कर दे, जग जीवन खुशहाल॥
लेखक— संजीव कुमार भटनागर






