March 5, 2026

संवाददाता

कानपुर। प्रत्येक कार्य के शुरुआत में बप्पा की मंगलमूर्ति का हम स्मरण करते हैं। गणेश की छवि हमारे मन में सहज रूप से बस जाती है, क्योंकि वे भक्तों के प्रेम में बंधे रहते हैं।  नगर में गणेश भगवान के मन्दिरों की संख्या वैसे तो कम ही है लेकिन जितनी भी हैं वह अपने भीतर कुछ न कुछ रहस्य अवश्य ही समेटे हुए है। फिर वो मन्दिर चाहे छोटे या बडे हो, उनकी विशेषताएं जग जाहिर हैं। आजादी के आन्दोलन में नगर के मन्दिरों का इतिहास भी जुडा है जहां आन्दोलन की रूप रेखा तय की जाती रही है। 

ऐसी दिव्य अनुभूति कानपुर के पास स्थित तीर्थ स्थल बिठूर के गणेश मंदिर में आसानी से होती है, जहां बप्पा की कृपा हर भक्त महसूस कर सकता है। 

इस गणपति सिद्धिविनायक मन्दिर की विशेषता सुनकर लोगों को आश्चर्य होना लाजमी हो जाता है। इस मन्दिर में स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा को सूर्य की पहली किरण द्वारा नमस्कार करने की बात कही जाती है जो सच प्रतीत होती है क्योंकि  मंदिर में तीन ओर ही दीवारे हैं सामने दीवार नही है। सूर्य की पहली किरण उन पर ही पडती है।

बिठूर के गणेश मंदिर का इतिहास आदि काल से जुड़ा हुआ है यह मंदिर 400 साल से भी ज्यादा पुराना है। क्रांतिकारी नानाराव पेशवा और रानी लक्ष्मीबाई भी यहां दर्शन के लिए आते थे। मंदिर में स्थापित गणपति बप्पा की मूर्ति का मुख पूर्व दिशा की ओर है, इसलिए सूर्य और चंद्रमा की पहली किरण सीधे बप्पा पर पड़ती है। यहां भगवान को सिद्ध विनायक रूप में पूजा जाता है और उन्हें सिंदूर चढ़ाया जाता है। 

बिठूर का यह गणेश मंदिर इतना सिद्ध और चमत्कारी माना जाता है कि यहां मांगी गई मनोकामनाएं बप्पा जल्दी पूरी कर देते हैं। सिंदूर से सजे हुए गणपति बप्पा के दर्शन और पूजा करने से व्यक्ति को अच्छा स्वास्थ्य, पापों से मुक्ति, अच्छे लोगों का साथ, योग्य संतान, लंबी आयु और आठों सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, एक बार अंग्रेज सेना ने इस मंदिर को तोप से उड़ाने की कोशिश की, तब मां गंगा खुद प्रकट हो गईं। अचानक गंगा में बाढ़ आ गई और मंदिर बालू में पूरी तरह ढंक गया। बहुत खोजने के बाद भी अंग्रेज सैनिक गणेश प्रतिमा ढूंढ नहीं पाए। काफी समय बाद लोगों ने बालू के नीचे से गणेश जी की प्रतिमा को निकाला और फिर से पूजा शुरू की। तब से यह स्थान और भी चमत्कारी माना जाने लगा। 

इस प्राचीन मंदिर में भगवान गणेश की प्रतिमा बाकी मंदिरों से अलग है। यहां बप्पा की सूंड़ दाहिनी ओर मुड़ी हुई है और वे अपने वाहन चूहे पर सवार हैं। ऐसी प्रतिमा बहुत ही दुर्लभ होती है और बहुत खास मानी जाती है। मन्दिर से जुडे दिलीप शुक्ला बताते है कि कई बार मन्दिर के सामने दीवार उठाने की कवायद की गयी लेकिन दीवार अपने आप ही भरभरा कर गिर गयी जिसके बाद मन्दिर को ढकने की योजना को खारिज ही कर दिया गया।