January 26, 2026

• गुटीय हिसाब-किताब का अखाड़ा बनता यूपीसीए।

संवाददाता

कानपुर। उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन अब क्रिकेट के विकास की संस्था कम और गुटीय राजनीति, बदले और जिलावार भेदभाव का मंच ज़्यादा नज़र आने लगा है। ताज़ा घटनाक्रमों ने यह सवाल ज़ोर-शोर से खड़ा कर दिया है कि क्या यूपीसीए में अब पद, सम्मान और भूमिका योग्यता से नहीं, बल्कि “वफादारी” और “लाइन में रहने” से तय हो रही है। 

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि गाजियाबाद जिला अचानक शीर्ष नेतृत्व की नाराज़गी का केंद्र बन गया है। गाजियाबाद के एक पदाधिकारी के पुत्र का टीम में चयन कोई नया या अपवाद नहीं था। वह खिलाड़ी इससे पहले भी टीम का हिस्सा रह चुका है। बावजूद इसके, इस चयन को लेकर संघ के भीतर आरोपों की बौछार शुरू हो गई कि पदाधिकारी ने अपने पद का दुरुपयोग कर बेटे को टीम में शामिल कराया।

आरोप–प्रत्यारोप का दबाव इतना बढ़ा कि संबंधित पदाधिकारी को अपने पुत्र का नाम टीम से हटाने के लिए विवश होना पड़ा। यही नहीं, उन्होंने बीसीसीआई तक ई-मेल भेजकर माफ़ीनामा भी सौंप दिया। इसे यह कहकर प्रचारित किया गया कि यूपीसीए अब ‘कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ को लेकर बेहद गंभीर हो चुका है।यूपीसीए के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जब पूर्व पदाधिकारियों के पुत्र बिना किसी विवाद के टीम का हिस्सा रहे। 

पूर्व सचिव युद्धवीर सिंह के पुत्र कार्तिक, तत्कालीन सीओओ दीपक शर्मा के दोनों पुत्रों सहित अन्य पदाधिकारियों के बेटे भी चयनित हुए—लेकिन तब न किसी ने सवाल उठाया, न कोई माफ़ीनामा माँगा गया और न ही कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट की याद आई।यह भी उल्लेखनीय है कि गाजियाबाद के इसी पदाधिकारी ने सहारनपुर डिस्ट्रिक्ट के डायरेक्टर के पुत्र अयान अकरम और उनके भांजे अमान अहमद के चयन पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई। उस समय न संघ को नैतिकता की चिंता हुई और न ही नियमों की।जहाँ गाजियाबाद के खिलाड़ियों और पदाधिकारियों के साथ ‘दुश्मनों जैसा’ व्यवहार किया जा रहा है, वहीं सहारनपुर से चुने गए खिलाड़ियों को “असाधारण टैलेंट”, “भविष्य का चेहरा” और “संस्था की रीढ़” बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही।

सवाल साफ़ है—यूपीसीए के भीतर से उठती आवाज़ें बताती हैं कि यह पूरी कवायद क्रिकेट सुधार की नहीं, बल्कि पुराने मतभेदों को निपटाने की रणनीति है। गाजियाबाद से चुने गए जिन पदाधिकारियों ने बीते समय में स्वतंत्र राय रखी, सवाल पूछे या ‘हाँ में हाँ’ नहीं मिलाई—आज वही सबसे पहले निशाने पर हैं।सूत्रों का दावा है कि गाजियाबाद के प्रतिनिधियों को जानबूझकर निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा जा रहा है। उनकी जिम्मेदारियाँ छीनी जा रही हैं और साफ़ संदेश दिया जा रहा है! और भी हैरान करने वाली बात यह है कि अचानक सहारनपुर को “टैलेंट हब” के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जबकि दशकों से गाजियाबाद उत्तर प्रदेश क्रिकेट को सबसे ज़्यादा खिलाड़ी, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक अनुभव देने वाले जिलों में अग्रणी रहा है।फिर ऐसा क्या बदल गया कि गाजियाबाद अयोग्य और सहारनपुर सर्वगुण संपन्न घोषित कर दिया गया? यूपीसीए से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी साफ़ शब्दों में कहते हैं—सबसे ख़तरनाक संकेत यह है कि अब जिला संघों में डर का माहौल बन रहा है। खुलकर बोलने की हिम्मत कम होती जा रही है, क्योंकि सभी जानते हैं—आज गाजियाबाद है, कल किसी और की बारी हो सकती है।यूपीसीए पहले ही विवादों, आरोपों और साख के संकट से जूझ रहा है। यदि शीर्ष नेतृत्व जिलों को आपस में लड़ाने और व्यक्तिगत बदले निकालने में ही उलझा रहेगा, तो नुकसान किसी एक जिले का नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश क्रिकेट का होगा।