
संवाददाता
कानपुर। उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से जुड़ी एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों संस्थाओं पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने यूपी क्रिकेट एसोसिएशन की संपत्तियों के स्वामित्व और बीसीसीआई के आचरण पर गंभीर सवाल उठाते हुए मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल नियत कर दी है।
यह याचिका ‘द क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तर प्रदेश’ नामक संस्था द्वारा दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि वर्ष 1955 में पंजीकृत ‘द उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन’ (पुरानी यूपीसीए) को भंग कर दिया गया, लेकिन उसकी सारी संपत्तियां और बैंक खाते अवैध रूप से वर्ष 2005 में कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत नई ‘उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन’ द्वारा हड़प लिए गए।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह देखना आवश्यक है कि जब सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 की धारा 13 के तहत कोई सोसायटी भंग हो जाती है, तो क्या उसकी संपत्तियां सरकार के पास निहित हो जाती हैं? अदालत ने कहा कि किसी अन्य संस्था नई यूपीसीए द्वारा पुरानी पुरानी यूपीसीए की देनदारियों को अपने हाथ में लेना और संपत्तियों का उपयोग करना कानूनी रूप से मान्य नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट ने वर्तमान यूपीसीए को आदेश दिया है कि वह अपनी किसी भी स्थावर संपत्ति का हस्तांतरण न करे। साथ ही, कोर्ट ने यूपीसीए को निर्देश दिया है कि वह अपनी चल संपत्ति, बैंक खातों और आय का पूरा ब्योरा अदालत में पेश करे और उसमें किसी भी प्रकार का हेरफेर न करे।याचिका में आरोप लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश के 39 जिलों के युवा क्रिकेटरों को यूपीसीए द्वारा उपेक्षित किया जा रहा है और टीम चयन में पूर्वाग्रह बरता जा रहा है।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि बीसीसीआई ने गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कई टीमों को मान्यता दी है, जबकि उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं किया गया। कोर्ट ने बीसीसीआई को निर्देश दिया है कि वह स्पष्ट करे कि यूपीसीए उससे संबद्ध है या नहीं और उसके पास क्या दस्तावेज हैं।
याचिका में केंद्र सरकार को लिखे एक पत्र का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया कि यूपीसीए पर करीब 90 करोड़ रुपये से अधिक का टैक्स बकाया है। साथ ही, यह भी तर्क दिया गया कि वर्तमान यूपीसीए के पदाधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है।याचिका में आरोप लगाया गया कि यूपीसीए के पदाधिकारी सुप्रीम कोर्ट के 2018 के आदेश (बीसीसीआई बनाम बिहार क्रिकेट) के विपरीत अपने पदों पर बने हुए हैं।कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया है कि जब खेल राज्य सूची का विषय है, तो उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश में क्रिकेट के विकास के लिए अब तक कोई नीति क्यों नहीं बनाई है।
हाईकोर्ट ने सभी पक्षों (यूपीसीए, बीसीसीआई, उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार) को चार सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। उन्हें विशेष रूप से याचिका में उठाए गए आरोपों और अदालत द्वारा तैयार किए गए कानूनी सवालों का जवाब देना होगा। मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल, 2026 को होगी। अदालत ने यूपीसीए की संपत्तियों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। उसे न तो संपत्ति बेचने की इजाजत है और न ही बिना अनुमति के अपने खातों से पैसे निकालने की। अदालत यह जांच कर रही है कि क्या यूपीसीए के पास क्रिकेट चलाने का कोई कानूनी अधिकार भी है, क्योंकि वह मूल रजिस्टर्ड संस्था नहीं है।
कोर्ट ने बीसीसीआई से यह साबित करने को कहा है कि यूपीसीए उसकी वैध इकाई है या नहीं। साथ ही, बीसीसीआई के चयन और संबद्धता की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। कोर्ट यह देखना चाहता है कि जहां बीसीसीआई एक सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन कर रहा है, वहां वह निष्पक्षता से काम कर रहा है या नहीं उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को भी इस मामले में जवाब देना है कि आखिर एक पंजीकृत सोसायटी के भंग होने के बाद उसकी संपत्ति एक निजी कंपनी नई यूपीसीए के पास कैसे चली गई, जबकि कानून कहता है कि ऐसी संपत्ति सरकार के पास जानी चाहिए।इस मामले में बात करने के लिए सीईओ अंकित चटर्जी से संपर्क स्थापित करने का काम किया गया लेकिन वह सवाल का जवाब देने को तैयार नहीं हुए।






