March 13, 2026

संवाददाता
कानपुर।
जिलाधिकारी ने पद्मश्री अवार्ड 2026 के लिए दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों के नाम केंद्र सरकार को भेजे हैं। पहला मकरावटगंज के धनीराम पैंथर का नाम विशिष्ट सेवा श्रेणी में भेजा गया है।
दूसरा शिवाला निवासी रणजीत सिंह का नाम विशिष्ट कला श्रेणी में प्रस्तावित किया गया है। दोनों ही व्यक्तियों ने पद्मश्री अवार्ड के लिए अपने नामों की संस्तुति कर भेजे जाने पर खुशी जताई है । 
धनीराम पैंथर सामाजिक संस्था के द्वारा लोगों की मदद करने का काम करते हैं। उन्होंने साल 2009 में जब लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करना शुरू किया। तो कई तरह के कमेंट भी सुनने को मिले।
लोगों ने यहां तक कहा अब इन्होंने लाश से ढोने का काम शुरू किया है। लेकिन उनने परवाह नहीं की । क्योंकि उनके मन में इंसानियत और मानवता को लेकर एक सवाल उठा था।
जब पहली बार लावारिश शवों को रिक्शा से लाद कर या गाड़ियों में लाकर ले जाते हुए उन्हें नदियों में फेंकता हुआ देखा। तब उन्हें लगा कि यह भी इंसान है ,इनका भी विधि विधान से अंतिम संस्कार जरूरी है।
इसके बाद से अब तक 2950 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार 16 सालों में कर चुके हैं। इसके लिए 10 लोगों की टीम बनाई है। शव को ले जाने के लिए संस्था के पास सहयोग से मिली हुई तीन गाड़ियां हैं।
कफन ,लकड़ी और अन्य सामान भी शहर के संपन्न लोगों से और अन्य लोगों के सहयोग से प्राप्त हो जाती हैं। इसके अलावा देहदान महादान संस्था की शुरुआत भी 2 महीने पूर्व की जहां सबसे पहले खुद और अपनी पत्नी के साथ देहदान करने का रजिस्ट्रेशन कराया। केवल 2 माह के भीतर ही 50 से ज्यादा लोगों ने देहदान करने के लिए संस्था में रजिस्ट्रेशन करा लिया है।
धनीराम पैंथर ने बताया कि 24 घंटे तक संस्था के 10 लोगों की टीम एक्टिव रहती है। कोरोना काल में भी हमारी टीम काम कर रही थी और उस समय संस्था के 50 लोगों को लावारिश शवों के अंतिम संस्कार के लिए लगाया गया था।
कोरोना के समय एक रिकॉर्ड बना था कि एक दिन में संस्था के द्वारा 109 शवों का अंतिम संस्कार कराया गया था ।

धनीराम पैंथर का जन्म एक बेहद साधारण परिवार मेंमकराबटगंज इलाके में 1965 में हुआ था। शुरू से ही लोगों की मदद करना उनके अंदर था, 1981 में 19 साल की उम्र में वह समाज सेवा में जुड़ गए।लगातार दबे कुचले मजलूमों के लिए वो मदद करते रहे ।

यह सिलसिला लगातार जारी है और बीते 16 सालों से वह कानपुर और कानपुर देहात में लावारिस शवों के अंतिम संस्कार कराने जाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सभी ने उनका सपोर्ट किया है।
जिला प्रशासन से लेकर पुलिस प्रशासन ने उन्हें हमेशा मदद की है। मुख्यमंत्री जी से भी एक बार मुलाकात के दौरान उन्होंने बात रखी थी कि पूरे उत्तर प्रदेश में वह इस तरह का काम भविष्य में करना चाहते हैं।
उन्होंने मांग भी की थी कि यूपी के सभी पोस्टमॉर्टम हाउस वातानुकूलित कराया जाए। धनीराम पैंथर सर्वधर्म सभा के राष्ट्रीय सचिव भी हैं, जो समाज में हिंदू मुस्लिम एकता के लिए पैगाम देने का काम भी करते हैं।
इसी तरह रणजीत सिंह को जब पता चला जिला प्रशासन ने उनका नाम पदम श्री के लिए भेजा है। तो उन्होंने बताया कि वह सोचते रहे कि वह हमेशा से इस बात का ख्याल करते थे, कि जब अंतिम विदाई हो तो तिरंगे में लिपट कर हो।
जैसे ही इस बात का पता चला कि पद्म श्री के लिए नाम भेजा गया है ,तो तुरंत ही आंखों में आंसू आ गए। रणजीत सिंह यह बात बताने के दौरान भी रोने लगे और भावुक हो गए।
उन्होंने कहा कि वह ताम्रपत्र की कला को जिंदा रखना चाहते हैं। इसलिए वह चाहते हैं की 82 वर्ष की उम्र में भी वह युवाओं को हाथों से बनाई जाने वाली इस कला को सिखाना चाहते हैं।राजस्थान के मूल निवासी रणजीत सिंह का जन्म आगरा में 1 सितंबर 1944 में हुआ था।
इसके बाद वह 6 साल की उम्र में अपने परिवार के साथ कानपुर आ गए। रणजीत सिंह ने बताया कि देश में हाथों से ताम्रपत्र पर तस्वीर उकेरने वाले वह अब अकेले शख्स हैं। यह कला हस्तशिल्पकारी उनको अपने खानदान से मिली थी।हाथों से तांबा और जस्ता पर तस्वीर उकेरने का काम करने के शौकीन उनका परिवार राजा महाराजा के गहने और उनके शीशे की डिजाइनों में किनारों पर लगे तांबा सोना चांदी की डिजाइन बनाने का काम करते थे।
बचपन में सुनारी का काम भी उनके सामने होता था, तो वह हाथों से तांबा और जस्ता पर तस्वीर उकेरने का काम सीखने लगे। इसी तरह से यह उनका शौक बन गया।रणजीत सिंह ने बताया कि उन्हें हिंदी पंजाबी राजस्थानी और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान है।
अपने परिवार में चार भाई और बहनों के साथ वह पले – बढ़े । उनके पिता ठाकुर बालकृष्ण सुनाती का काम करते थे। पिताजी के न रहने के बाद उन्होंने नौकरी शुरू की और फिर शिवाले में ही कपड़े का कारोबार शुरू किया।
रणजीत सिंह ने बताया सिर्फ शौक को जीवन भर उन्होंने अपनी कला को जीवित रखने के लिए तांबे और जस्ता पर अपने हाथों से कई ऐतिहासिक तस्वीरें उन्होंने उकेरी।
सौभाग्य मिला कि देश के कई प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई से लेकर मनमोहन सिंह और एच डी देवगौड़ा।इसके अलावा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रतिभा पाटिल, खिलाड़ियों में सचिन तेंदुलकर, राजनीतिक लोगों में सोनिया गांधी तक उनकी तस्वीरें भेंट के रूप में पहुंची।
इसके अलावा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रतिभा पाटिल, खिलाड़ियों में सचिन तेंदुलकर, राजनीतिक लोगों में सोनिया गांधी तक उनकी तस्वीरें भेंट के रूप में पहुंची।
उन्हें इसके लिए कई सम्मान भी मिले हैं। लोगों ने उनकी कला की प्रशंसा भी की लेकिन उनका सपना था कि ताम्रपत्र पर बना राम मंदिर का चित्र वह अपने हाथों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दें। लेकिन योगी जी के द्वारा कानपुर में मंच पर पीएम को तस्वीर भेंट की गई थी ।
इन ऐतिहासिक चित्रों को ताम्रपत्र पर रणजीत सिंह ने बनाया है शिल्पकार रणजीत सिंह ने ताम्रपत्र पर 1857 गदर स्वतंत्रता संग्राम, लखनऊ का रूमी दरवाजा, यूपी विधानसभा, संसद भवन, आगरा का ताजमहल, कानपुर की लाल इमली, बिठूर के ऐतिहासिक घाट, कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम में बनी विजिटर गैलरी में लगी 24 क्रिकेटर की तस्वीर, महात्मा गांधी की दांडी यात्रा की ताम्रपत्र पर बना चुके हैं। 

रणजीत सिंह को अबतक भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी द्वारा हिन्दी साहित्य सम्मेलन में सम्मानित किया।
उप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, लखनऊ द्वारा राज्यपाल मोतीलाल वोरा द्वारा सम्मानित किया गया। अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग 1989 धरशास्त्री द्वारा सम्मानित किया गया।
हिन्दी सेवा निधि के कार्यक्रम में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त द्वारा सम्मानित किया गया। महामहिम विष्णुकांत शास्त्री राज्यपाल उप्र द्वारा सम्मानित 2003 में यूपी कॉन रजत जयन्ती वर्ष पर सेवा सम्मान किया गया। केसरीनाथ त्रिपाठी द्वारा सम्मानित 2005 राष्ट्रीय भाषा हिन्दी सेवा सम्मान भर्टना जिला इटावा।