January 17, 2026

संवाददाता
कानपुर।
  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौरव गुप्ता की उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें पारिवारिक अदालत के पत्नी रितिका गुप्ता और बेटी को कुल 40,000 रुपया प्रति माह गुजारा भत्ता देने के आदेश को चुनौती दी गई थी।
यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकलपीठ ने दिया। कानपुर नगर के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने 8 अक्टूबर 2024 को पारित आदेश से याची की पत्नी और बेटी, दोनों को बीस बीस हजार रुपया प्रति माह कुल 40,000 रुपए भरण-पोषण के रूप में देने का निर्देश दिया था।
याचिका में कहा गया कि भरण-पोषण की कुल राशि बहुत अधिक है। याची एक कंपनी में निदेशक हैं, उसे नुकसान होने के कारण वह मात्र 2,40,000 प्रति वर्ष यानी 20,000 रुपया प्रति माह कमा पाता है। उसकी पत्नी पढ़ी लिखी है । उसके पास इंटीरियर डिजाइनिंग की डिग्री है। शादी से पहले वह कमाती थी। इसलिए भत्ता राशि कम की जाय।
पत्नी की तरफ से कहा गया कि वह स्वयं और अपनी बेटी का भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं। भले ही पत्नी अत्यधिक योग्य हैं, लेकिन वह वर्तमान में बच्चे की देखभाल के कारण काम करने में असमर्थ हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि पत्नी शिक्षित है और कुछ कमा सकती है, उसके भरण-पोषण के दावे को खारिज करने का यह आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने माना कि पति के पास पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करने के पर्याप्त साधन हैं। पति ने जानबूझकर अपनी वास्तविक आय छिपाने का प्रयास किया।
अगर कंपनी को नुकसान हुआ तो उसके पिता और माता  का वेतन कैसे बढ़ गया। न्यायालय ने इसे भरण-पोषण देने से बचने का जानबूझकर किया गया कृत्य माना। न्यायालय ने कहा कि एक सक्षम और स्वस्थ युवा व्यक्ति को अपनी पत्नी और बच्चों के लिए पर्याप्त कमाई करने में सक्षम माना जाता है।
हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए अर्जी खारिज कर दी। 

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