—ग्यारह दिनों के बाद गणपति चले अपने धाम।

संवाददाता
कानपुर। पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए, इस बार कई परिवारों ने गणपति विसर्जन अपने घरों में किया। किसी ने अपने घरों के बगीचे में गढढे करके उसमें पानी भरकर गणपति विसर्जित किए, जबकि किसी ने बाल्टी या टब में उन्हें विसर्जित करके पौधों की क्यारियों में उस जल को समाहित कर दिया और अगले बरस फिर से जल्दी आने की प्रार्थना की।
इस प्रकार की अनूठी पहल कानपुर नगर के श्याम नगर क्षेत्र में शुरू की गई और वहां के निवासियों ने इसमे बढ़ चढ़ कर भागीदारी करी वहां के निवासी प्रिया राजीव शुक्ला ने बताया की हम लोग करीब 26 वर्षों से गणपति बप्पा को विराजमान करते है पहले हम लोग विसर्जन के लिए गंगा जी जाते थे लेकिन विगत कुछ वर्ष पूर्व प्रशासन ने पर्यावरण संरक्षण के लिए गंगा जी के किनारे ही तालाब बनवा कर विसर्जन करवाना शुरू किया था तो उससे ही प्रोत्साहित होते हुए हम लोगो ने घर मे ही एक बड़े भगौने में गंगा जल,फूल डाल कर उसमे ही विसर्जन करना शुरू किया चूंकि गणेश जी मिट्टी के बने होते है तो वो कुछ ही पलों में जल में समाहित हो जाते है उसके बाद उस जल को घर मे बने बगीचे की क्यारियों में समर्पित कर देते है यहां हमारे पड़ोसी मोना अभिषेक तिवारी, कंचन आर के श्रीवास्तव, मंजू दिलीप सिंह, आदि अनेको परिवार है जो इसी प्रकार विसर्जन करते है और यह क्रिया जलाशयों नदियों में प्रदूषण को कम करती है और लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाती है। इस तरीके से, न केवल जल प्रदूषण रुकता है, बल्कि नदी पारिस्थितिकी तंत्र को भी बचाया जाता है, जिससे पर्यावरण और पानी के जीवों को लाभ होता है।
पारंपरिक विसर्जन से नदियों और झीलों में प्लास्टर ऑफ पेरिस और जहरीले रंगों का प्रदूषण बढ़ता है, जिससे जलीय जीवों पर बुरा असर पड़ता है।घरों पर विसर्जन करने से यह प्रदूषण रुक जाता है। घरों में किए गए विसर्जन के बाद प्रतिमा की मिट्टी को गमलों में डालकर नए पौधे उगाए जा सकते हैं। कुछ मामलों में, मूर्तियों में बिल्व पत्र, तुलसी या अन्य फूलों के बीज डाले जाते हैं। यह पहल लोगों को पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक करती है और उन्हें टिकाऊ जीवन शैली अपनाने के लिए प्रेरित करती है।
वहीं दूसरी ओर पाण्डालों में स्थापित बडी मूर्तियों को उनके लिए बनाए गए कृत्रिम तालाबों में विसर्जित किया गया। बडी मूर्तियों को गणपति बप्पा मोरया…अगले बरस तू जल्द आ जयकारों के साथ विसर्जन किया गया।
अनंत चर्तुदशी के दिन शनिवार को भक्त वाहनों पर विराजमान करके गणपति को लेकर गंगा घाटों पर पहुंचे। वहां पर नम आंखों से गणपति को विदाई दी गई। बप्पा को विदायी देने के लिए भक्त झूमते-नाचते वाहनों पर गजानन को विराजमान कर गंगा घाट पहुंचे। रास्ते भर गजानन पर फूल बरसाए जाते रहे। नम आंखों से गणपति को विदाई दी गई।






