March 16, 2026

संवाददाता 
कानपुर।
भ्रष्टाचार पर बड़ी कार्रवाई करते हुए मंडलायुक्त के. विजयेंद्र पांडियन ने घूसखोर लेखपाल आलोक दुबे को सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया। मुख्यमंत्री की बैठक के ठीक अगले दिन हुई इस कार्रवाई में सामने आया कि लेखपाल ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए करीब 50 करोड़ रुपए से अधिक कीमत की 41 संपत्तियां खड़ी कर ली थीं।
जांच में बेनामी संपत्तियों और जमीनों के क्रय-विक्रय में संलिप्तता भी सामने आई, जिसके बाद उसकी अपील खारिज कर दी गई और उसे तत्काल प्रभाव से सेवा से हटा दिया गया।
मंडलायुक्त ने बताया कि लेखपाल पर आय से अधिक संपत्ति होने का भी आरोप लगा। 

डीएम जितेन्द्र प्रताप सिंह ने मामले की कमेटी बनाकर जांच कराई तो लेखपाल के पास 50 करोड़ से ज्यादा की 41 संपत्तियां सामने आई थीं। लेखपाल जांच में दोषी पाया गया था। इसके बाद मामले में सुनवाई के लिए लेखपाल मंडलायुक्त के पास अपील में गया।
मंडलायुक्त ने अपील की सुनवाई के बाद शनिवार को अपने आदेश में कहा कि अपीलकर्ता ने राजस्व निरीक्षक के रूप में रहते हुए अपने पद और अधिकारों का दुरुपयोग कर निजी स्वार्थ सिद्धि के लिए भूमियों का क्रय-विक्रय किया और आय से अधिक संपत्ति अर्जित की।
यह कृत्य अत्यंत गंभीर प्रकृति का है और उत्तर प्रदेश सरकारी सेवा आचरण नियमावली के विपरीत है। आदेश में यह भी कहा गया कि ऐसे कर्मचारी को राजकीय सेवा में बनाए रखना जनहित और विभागीय हित में उचित नहीं है।
इसी आधार पर मंडलायुक्त ने अपील निरस्त करते हुए आलोक दुबे, तत्कालीन राजस्व निरीक्षक और वर्तमान लेखपाल को तत्काल प्रभाव से पद और राजकीय सेवा से बर्खास्त करने का आदेश दिया।
रजिस्ट्री विभाग के सहायक महानिरीक्षक निबंधन की रिपोर्ट ने तो प्रशासन को पूरी तरह चौंका दिया। जांच में सामने आया कि आलोक दुबे, उसकी पत्नी और बच्चों के नाम पर कानपुर, दिल्ली और नोएडा तक में 50 करोड़ रुपये से ज्यादा की अकूत संपत्तियां हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दुबे ने जिन संपत्तियों की जानकारी दी है, असलियत में संख्या और कीमत इससे कहीं अधिक हो सकती है।
स्थानीय सूत्र बताते हैं कि जब कानपुर में रिंग रोड परियोजना की घोषणा हुई थी, तो दुबे को इसकी जानकारी पहले ही मिल गई थी। उसने दूल गांव और आसपास के इलाकों में जमीनों की खरीद-फरोख्त शुरू कर दी।
अनुमान है कि इस दौरान उसने करीब 56 संपत्तियों में निवेश किया। सर्किल रेट के मुताबिक संपत्तियों की कीमत भले ही 50 से 60 करोड़ है, लेकिन सच्चाई तो ये है कि घूसखोर लेखपाल अरबों का मालिक है।
मार्च 2025 में आलोक दुबे के खिलाफ कोतवाली थाने में मुकदमा दर्ज किया गया। विभागीय जांच में उसके खिलाफ चार गंभीर आरोप तय किए गए। अगस्त 2025 में व्यक्तिगत सुनवाई भी हुई। जांच अधिकारी ने स्पष्ट कहा कि दुबे लंबे समय से बिना अनुमति भूमि की खरीद-फरोख्त कर रहा था और उसने सरकारी सेवा आचरण नियमों का खुला उल्लंघन किया है।
डीएम ने आदेश जारी करते हुए लिखा कि राजस्व अभिलेखों में हेरफेर और धोखाधड़ी से जनता का भरोसा टूटता है, इसलिए कठोर कदम जरूरी हैं. इसी आधार पर उसे कानूनगो से डिमोशन करके लेखपाल बना दिया गया। प्रशासन ने यह भी साफ किया कि अब ऐसे अधिकारियों को किसी भी तरह बख्शा नहीं जाएगा। डिमोशन के बाद अब उसके खिलाफ बर्खास्तगी यानी सेवा समप्त करने की कार्रवाई की गई है।
मामले में न सिर्फ आलोक दुबे, बल्कि उसके साथ काम करने वाले कुछ अन्य राजस्व कर्मियों की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई थी। विशेष रूप से क्षेत्रीय लेखपाल अरुणा द्विवेदी का नाम जांच में सामने आया था। प्रशासन ने संकेत दिया है कि यदि जांच में उनकी संलिप्तता पाई जाती है, तो उन पर भी कठोर कार्रवाई होगी। फिलहाल अभी तक अरुणा की जांच कहां तक पहुंची अफसर यह साफ नहीं कर सके हैं।
स्थानीय लोगों के मुताबिक आलोक दुबे सिर्फ सरकारी अधिकारी ही नहीं, बल्कि जमीन कारोबारियों के लिए भी ‘सेटिंग मास्टर’ बन चुका था. आरोप है कि वह जमीन माफिया को पहले से सूचना देता था कि किस क्षेत्र में सड़क या रिंग रोड की योजना बनने वाली है। इसी आधार पर माफिया उस इलाके में बड़े पैमाने पर जमीन खरीद लेते थे और बाद में लाखों-करोड़ों कमाते थे. बदले में दुबे को भी मोटा हिस्सा मिलता था। प्रॉपर्टी डीलर और बिल्डरों के साथ मिलकर उसने अरबों की संपत्तियां खड़ी कर ली हैं।
लेखपाल सबसे छोटे स्तर का अधिकारी माना जाता है। उसका काम ग्राम स्तर पर भूमि का रिकॉर्ड रखना और छोटे-छोटे विवादों को निपटाना होता है। वहीं, कानूनगो उससे ऊपर का पद है, जो कई लेखपालों की देखरेख करता है। अधिकारियों का कहना है कि आलोक दुबे के डिमोशन और अब बर्खास्तगी से साफ संदेश दिया गया है कि भ्रष्टाचार अफसर कितना भी रसूखदार हो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। 

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