
संवाददाता
कानपुर। आईआईटी कानपुर में पिछले 2 साल के दौरान 8 छात्रों और एक शोध फैकल्टी सदस्य की मौत हुई है। इन घटनाओं के बाद संस्थान की मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली में बदलाव किया गया है। अब मनोचिकित्सक और काउंसलर सीधे छात्रों तक पहुंचेंगे। यह सहायता हॉस्टल के कमरों, क्लासरूम, विभागों और छात्र गतिविधि केंद्रों पर उपलब्ध होगी।
आईआईटी कानपुर से जुड़े वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. आलोक बाजपेई ने बताया कि संस्थान ने हाल ही में सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग की शुरुआत की है। इसका लक्ष्य अगले छह महीने से एक साल के भीतर हर छात्र और फैकल्टी सदस्य से संपर्क करना है। इसके लिए फीडबैक सिस्टम, कार्यशालाएं, जागरूकता अभियान और स्टूडेंट कनेक्ट प्रोग्राम तैयार किए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जिन छात्रों की मौत हुई, उनमें से किसी ने भी औपचारिक रूप से काउंसलिंग सेल से संपर्क नहीं किया था। वे मानते हैं कि यह खामोशी एक बड़ा खतरा है। तनाव, अकेलापन, रिश्तों की उलझनें और परिवार की अपेक्षाएं छात्रों पर आंतरिक दबाव बनाती हैं, जिसका अक्सर आसपास के लोगों को भी पता नहीं चल पाता।
संस्थान ने अकादमिक स्तर पर भी छात्रों को राहत देने के लिए कदम उठाए हैं। इनमें सप्लीमेंट्री परीक्षाएं, विशेष परीक्षा का विकल्प, सेमेस्टर ड्रॉप की सुविधा और सीनियर्स व प्रोफेसर्स की सक्रिय मदद शामिल है। इन उपायों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्र खुद को असफल महसूस न करें।
आईआईटी कानपुर की यह पहल मानसिक स्वास्थ्य के महत्व और शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की भलाई सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।





